Rajasthan Jodhpur Major Dalpat Singh Story : राजस्थान के पाली जिले से निकले मेजर दलपत सिंह ने 23 सितंबर 1918 को हाइफा की लड़ाई में जो पराक्रम दिखाया, उसने उन्हें हाइफा हीरो बना दिया. रीढ़ में गोली लगने के बाद भी वे डटे रहे और अंतत: वीरगति प्राप्त की. उनका बलिदान आज भी भारत और इजराइल दोनों देशों में सम्मान के साथ याद किया जाता है.
भारतीय सेना के इतिहास में अनगिनत उदाहरण हैं, जब विपरीत परिस्थितियों में भी जवानों ने दुश्मन को परास्त कर किले फतह किए. विदेशी धरती पर भी भारतीय सैनिकों ने अपने रक्त से शौर्य गाथाएं लिखकर देश का मान बढ़ाया है. आज हम ऐसे ही एक शूरवीर की बात कर रहे हैं, जिन्हें दुनिया ‘हाइफा हीरो’ के नाम से जानती है, मेजर दलपत सिंह.
पाली के देवली गांव से निकला शूरवीर
मेजर दलपत सिंह का जन्म 26 जनवरी 1892 को पाली जिले के देवली गांव में हुआ था. वे रावणा राजपूत समाज से थे. उनके पिता कर्नल हरि सिंह सेना में अधिकारी और एक उत्कृष्ट पोलो खिलाड़ी थे. वीरता उन्हें विरासत में मिली थी. दलपत सिंह ने अपनी उच्च शिक्षा इंग्लैंड के ईस्टबर्न कॉलेज से प्राप्त की. मात्र 18 वर्ष की आयु में वे सेना में भर्ती हुए और जोधपुर लांसर्स में तैनात किए गए. 4 अगस्त 1914 को उन्होंने फ्रांस में जर्मनों के खिलाफ युद्ध में हिस्सा लिया. बाद में हाइफा की ऐतिहासिक लड़ाई में उनके अदम्य साहस के लिए ब्रिटेन ने उन्हें मरणोपरांत मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया. जोधपुर की पूर्व विधायक और उनके परिवार की वंशज मनीषा पंवार भी उनके शौर्य पर गर्व व्यक्त करती हैं.
प्रथम विश्व युद्ध और हाइफा की जंग
23 सितंबर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इजराइल का रणनीतिक बंदरगाह हाइफा तुर्की और जर्मन सेनाओं के कब्जे में था. दुश्मन के पास मशीनगनें, तोपें और आधुनिक हथियार थे. दूसरी ओर मेजर दलपत सिंह के नेतृत्व में जोधपुर लांसर्स के घुड़सवार थे. ब्रिटिश सेना ने हाइफा को मुक्त कराने की जिम्मेदारी भारतीय सैनिकों को सौंपी. इतिहास गवाह है कि रेगिस्तान के इन शेरों ने असंभव को संभव कर दिखाया. पारंपरिक तलवारों और भालों के सहारे उन्होंने आधुनिक हथियारों का सामना किया. कुछ ही घंटों में लगभग 1000 घुड़सवारों ने 400 वर्ष पुराने ऑटोमन साम्राज्य की पकड़ ढीली कर दी और हाइफा को आजाद कराया.
रीढ़ में गोली लगी, पर नहीं रुका संघर्ष
युद्ध के दौरान मशीनगन की गोलियां मेजर दलपत सिंह की रीढ़ में जा लगीं. वे गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उनका संकल्प अडिग रहा. असहनीय पीड़ा के बावजूद वे तब तक लड़ते रहे जब तक तुर्की सेना ने घुटने नहीं टेक दिए. जीत के कुछ घंटों बाद उन्होंने वीरगति प्राप्त की. उनके अद्वितीय बलिदान के लिए ब्रिटेन ने उन्हें मरणोपरांत मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया. दिल्ली का तीन मूर्ति चौक इन्हीं जांबाज सैनिकों की स्मृति में स्थापित है और हर वर्ष 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाकर उनके बलिदान को याद किया जाता है. इजराइल के स्कूलों में आज भी उनकी वीरता का इतिहास पढ़ाया जाता है.
प्रधानमंत्री ने भी किया नमन
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अजमेर की धरती से मेजर दलपत सिंह के शौर्य को नमन किया. उन्होंने कहा कि उन्हें इजराइल की संसद में इस वीर योद्धा की गाथा सुनाने का गौरव प्राप्त हुआ. प्रधानमंत्री ने कहा कि 23 सितंबर 1918 को हाइफा को तुर्की सेना से मुक्त कराने में राजस्थान के इस सपूत ने अद्भुत साहस दिखाया. उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना लड़ाई लड़ी और वीरगति प्राप्त की. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि इजराइल के लोग आज भी मेजर दलपत सिंह के बलिदान को सम्मान और गर्व के साथ याद करते हैं. राजस्थान के वीर बांकुरों की भूमिका हाइफा को आजाद कराने में ऐतिहासिक रही है, जिसे दुनिया हमेशा याद रखेगी.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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