पूर्वी सिंहभूम गालूडीह थाना क्षेत्र के पुतडु गांव निवासी उप मुखिया आशा रानी पाल के पति तारापादो महतो (35) की सोमवार की रात अपराधियों ने गोली मारकर हत्या कर दी। अपराधियों ने दारीसाई स्थित हाईवे किनारे उसकी दुकान में घुसकर कनपटी पर गोली मारी। घटना के ब
सूचना मिलते ही मुसाबनी डीएसपी संदीप भगत, गालूडीह थाना और घाटशिला थाना की पुलिस भारी बल के साथ मौके पर पहुंची और स्थिति को संभालते हुए जांच शुरू की। पुलिस ने घटनास्थल से एक खाली कारतूस बरामद किया है।
प्रारंभिक जांच में हत्या के पीछे भूमि विवाद सामने आया है। कुछ दिन पूर्व तारापादो महतो का भूमि को लेकर जितेंद्र दुबे से विवाद हुआ था। तब पुलिस ने जितेंद्र दुबे को पिस्तौल के साथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। हाल के दिनों में फिर एक बार हराधन सिंह के साथ तारापादो महतो का विवाद हुआ था, जिसमें मारपीट की घटना भी सामने आई थी। इस मामले में तारापादो महतो की शिकायत पर हराधन सिंह को जेल भेजा गया था।
गालूडीह की धरती पर फिर बहा कुड़मी नेता का खून
वर्ष 2007 से लेकर 2026 तक झारखंड के घाटशिला अनुमंडल की धरती बार-बार महतो नेतृत्व की हत्या से रक्तरंजित होती रही है। सोमवार की रात झारखंड के युवा कुड़मी नेता की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना इस क्षेत्र में कुड़मी नेताओं की 5वीं हत्या मानी जा रही है, जिससे पूरे इलाके में सनसनी फैल गई है।
घाटशिला क्षेत्र में कुड़मी नेताओं की हत्या का सिलसिला सबसे पहले नक्सलियों द्वारा शुरू किया गया था। होली के दिन 4 मार्च 2007 को झारखंड मुक्ति मोर्चा के लोकप्रिय सांसद सुनील महतो, उनके चारगोरखा बॉडीगार्ड तथा झामुमो के प्रखंड अध्यक्ष प्रभाकर महतो की नक्सलियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
यह वारदात गालूडीह थाना क्षेत्र के बंगाल सीमा से सटे बाघुड़ियागांव में एक फुटबॉल मैच के दौरान अंजाम दी गई थी। इसके बाद नक्सलियों ने मुखबिरी के आरोप में पिंडराबाद गांव निवासी ने संतोष महतो की हत्या की। कुछ ही दिनों बाद गालूडीह थाना क्षेत्र के चांडरीगांव निवासी झामुमो नेता कृष्णा महतो को भी गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया।
17 साल बाद एक बार फिर पुराने जख्मों को हरा कर दिया
ये सभी घटनाएं वर्ष 2007 से 2009 के बीच हुई थीं, जिसने पूरे इलाके के कुड़मी समुदाय को भय और असुरक्षा के साए में धकेल दिया था। समय के साथ क्षेत्र से नक्सलवाद लगभग समाप्त हो गया और हालात सामान्य होते चले गए। लेकिन 17 साल बाद एक बार फिर कुड़मी नेता की हत्या ने पुराने जख्मों को हरा कर दिया है।
इस ताजा घटना से कुड़मी समुदाय में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। स्थानीय लोगों और राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस हत्या को राजनीतिक साजिश के रूप में देखा जा रहा है। फिलहाल पुलिस जांच में जुटी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या घाटशिला की राजनीति एक बार फिर हिंसा के उस दौर में लौट रही है, जिससे निकलने में वर्षों लग गए थे।
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