Jamshedpur News: कपड़गड़ी घाट का मां जगत जननी रंकिनी मंदिर केवल श्रद्धा ही नहीं आध्यात्म का भी केंद्र है. यहां आकर लोगों को ऐसा सुकून और शांति मिलती है कि सारी हताशा दूर हो जाती है. कहते हैं कि मां की आंखों में देखने मात्र से शांति का संचार होता है.
हाता मुख्य मार्ग पर प्रकृति की गोद में बसा कपड़गड़ी घाट का मां जगत जननी रंकिनी मंदिर श्रद्धा, सौंदर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र है. जादूगोड़ा से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि मन को शांति देने वाला प्राकृतिक धाम भी है. यहां विराजमान मां रंकिनी की प्रतिमा चांदी जैसी चमकती आंखों से सुसज्जित है, जिन्हें देखते ही भक्त भाव-विभोर हो उठते हैं. मान्यता है कि मां के दर्शन मात्र से मन की व्याकुलता दूर होती है और जीवन में सकारात्मकता का संचार होता है. पुराने से पुराना डिप्रेशन भी दूर होने लगता है.

मंदिर के सामने पहाड़ी पर स्थापित बजरंगबली की भव्य प्रतिमा पूरे क्षेत्र की दिव्यता को और बढ़ा देती है. चारों ओर फैली हरियाली, पहाड़ों की शृंखलाएं और नीचे दिखाई देता मनोरम दृश्य इस स्थान को धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों के लिए भी खास बनाता है. सुबह और शाम के समय यहां का वातावरण बेहद शांत और पवित्र महसूस होता है, मानो प्रकृति स्वयं ध्यान में लीन हो. यहां कुछ पल बैठना भी आत्मिक सुकून दे जाता है.

स्थानीय निवासी सौरव बताते है कि मां रंकिनी को दुर्गा स्वरूप में पूजा जाता है. मंगलवार और शनिवार को विशेष पूजा-अर्चना होती है, जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते है. भक्त लाल कपड़े में सुपाड़ी, नारियल और अक्षत बांधकर मंदिर परिसर में टांगते हैं, जो उनकी मनोकामनाओं का प्रतीक होता है. लोकविश्वास है कि जब इच्छा पूरी होती है तो यह बंधन अपने आप खुल जाता है. गर्भगृह में किसी पारंपरिक मूर्ति के बजाय एक काले पत्थर की पूजा देवी के रूप में की जाती है. मंदिर के पुजारी परंपरागत रूप से सहाड़ा गांव के भूमिज समाज से होते हैं, और वर्तमान में अनिल सिंह पूजा-अर्चना का दायित्व निभा रहे हैं.
Add News18 as
Preferred Source on Google

मंदिर का इतिहास रहस्यमय कथाओं से जुड़ा है. एक मान्यता के अनुसार धालभूमगढ़ के राजा जगन्नाथ धाल ने इसकी स्थापना कराई थी. वहीं एक अन्य लोककथा कहती है कि प्राचीन समय में एक आदिवासी व्यक्ति ने जंगल में आभूषणों से सजी एक दिव्य कन्या को देखा, जो अचानक अदृश्य हो गई. उसी रात देवी ने स्वप्न में प्रकट होकर मंदिर निर्माण का आदेश दिया. समय के साथ यह स्थान आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया.

वर्तमान मंदिर का निर्माण लगभग 1950 के आसपास माना जाता है और 1954 में इसके प्रबंधन के लिए ट्रस्ट का गठन किया गया. हालांकि संरचना अपेक्षाकृत नई है, लेकिन यहां की आस्था सदियों पुरानी प्रतीत होती है. मां जगत जननी रंकिनी का यह धाम आज भी श्रद्धा, प्रकृति और अध्यात्म का जीवंत संगम है, जहां आकर हर भक्त अद्भुत शांति और दिव्य शक्ति का अनुभव करता है.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.