स्थानीय निवासी नादिर बताते हैं कि क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या सड़क और नाली की है. “बरसात आते ही पूरा इलाका तालाब बन जाता है. पानी निकलने का कोई रास्ता नहीं है. कीचड़, बदबू और मच्छरों से हालात बदतर हो जाते हैं,” वे कहते हैं. उनका यह भी आरोप है कि होल्डिंग टैक्स हर साल बढ़ता जा रहा है, लेकिन सुविधाओं के नाम पर कुछ भी नहीं मिलता.
नशा चिंता का कारण
अफजल का दर्द भी कुछ ऐसा ही है. वे सफाई व्यवस्था को लेकर नाराज हैं. “सड़कों के किनारे कचरे के ढेर लगे रहते हैं. लोग भी कहीं भी कचरा फेंक देते हैं, लेकिन उसे उठाने वाला कोई नहीं. नगर निगम जैसे गहरी नींद में सोया हुआ है,” वे कहते हैं. उनका मानना है कि नियमित कचरा उठाव और सफाई व्यवस्था दुरुस्त हो तो आधी समस्याएं अपने आप खत्म हो जाएं.
रॉबिन एक अलग लेकिन गंभीर मुद्दा उठाते हैं. उनके अनुसार सड़क, नाली और सफाई तो पुरानी समस्याएं हैं, लेकिन अब युवाओं में बढ़ता नशा चिंता का बड़ा कारण बन गया है. “नशे की वजह से इलाके में छोटे–मोटे अपराध बढ़ रहे हैं. कई युवा गलत रास्ते पर जा रहे हैं. अगर इस पर रोक नहीं लगी तो आने वाले समय में हालात और खराब होंगे,” वे चेतावनी देते हैं.
समय और सेहत दोनों पर असर
जीतन रोजमर्रा की परेशानी बताते हैं. “सड़कों में इतने गड्ढे हैं कि रात में घर सुरक्षित पहुंच जाना ही बड़ी बात लगती है. धूल, टूटी सड़क और जाम की वजह से 10 मिनट का रास्ता 40–50 मिनट में तय करना पड़ता है,” वे कहते हैं. खराब सड़कों का असर लोगों के समय और सेहत दोनों पर पड़ रहा है.
नंदलाल ट्रैफिक जाम को सबसे बड़ी आर्थिक मार बताते हैं. “पहले महीने में 2000 रुपये का तेल लगता था, अब 4000–5000 रुपये खर्च हो जाते हैं. दूरी वही है, लेकिन जाम में गाड़ी रेंगती रहती है,” वे कहते हैं.
मानगो की जनता की आवाज साफ है- सड़क, नाली, सफाई, ट्रैफिक और युवाओं को नशे से बचाने जैसे मुद्दे उनके लिए चुनावी वादों से ज्यादा अहम हैं. अब देखना यह है कि मेयर की कुर्सी पर बैठने वाला उम्मीदवार इन जमीनी समस्याओं को कितनी गंभीरता से हल करता है.
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