राजस्थान को गहलोत की भ्रष्टाचार वाले दौर से बाहर लाए हैं भजनलाल?
सत्ता संभालने के दो साल तीन महीने बाद भी, भजनलाल शर्मा की सरकार को राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में, यहां तक कि BJP के कुछ तबकों में भी ‘अनुभवहीन’ और ‘नौकरशाही पर बहुत ज़्यादा निर्भर’ रहने के आरोप लगते रहते हैं. BJP के कुछ विधायकों, जैसे शंकर सिंह रावत और गोपाल शर्मा ने सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वह नौकरशाहों पर तो भरोसा करती है, लेकिन उन्हें और पार्टी कार्यकर्ताओं को नज़रअंदाज़ करती है.
मुख्यमंत्री का पद संभालने से पहले, शर्मा को BJP के गलियारों में सिर्फ़ एक ‘संगठन का आदमी’ माना जाता था, जिसने पहले कभी कोई प्रशासनिक पद नहीं संभाला था.
हालांकि, पिछली अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के विपरीत, शर्मा सरकार को अब तक किसी बड़े विवाद या भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना नहीं करना पड़ा है.
अपने 2018-23 के कार्यकाल के दौरान, गहलोत सरकार कई घोटालों और विवादों से घिरी रही थी. इनमें विभिन्न सरकारी भर्ती परीक्षाओं में बार-बार पेपर लीक होना, राज्य की मिड-डे मील योजना से जुड़ा कथित 2,000 करोड़ रुपये का घोटाला और सरकार के गलत कामों का हिसाब-किताब रखने वाली एक कथित लाल डायरी शामिल हैं.
वसुंधरा, भैरों सिंह शेखावत जैसे दिग्गजों की परछाईं से अलग हैं भजनलाल
59 वर्षीय शर्मा अपने BJP के पूर्ववर्तियों-जिनमें दो बार मुख्यमंत्री रहीं वसुंधरा राजे और तीन बार मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय भैरों सिंह शेखावत शामिल हैं की बड़ी विरासत को संभालने की कोशिश कर रहे हैं. इन पूर्ववर्तियों का राजस्थान में पार्टी पर पूरा नियंत्रण था और उनका राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन का आधार भी बहुत मज़बूत था. यहां तक कि तीन बार मुख्यमंत्री रहे गहलोत भी अपने कार्यकाल के दौरान राज्य प्रशासन और कांग्रेस संगठन, दोनों पर पूरी तरह से हावी रहते थे.
इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में राजस्थान के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि राज्य के कई BJP नेता भजनलाल शर्मा के काम करने के तरीके को ‘दबे-दबे और फीके’ अंदाज़ वाला मानते हैं. राजस्थान के लोगों के मन में नेतृत्व की एक खास छवि बनी हुई है जिसे शेखावत, राजे और गहलोत जैसे नेताओं ने गढ़ा था, जो अपने प्रभाव और सत्ता का खुलकर इस्तेमाल रहे. लेकिन, सत्ता के शीर्ष पर बैठे मौजूदा नेताओं में उस तरह का राजनीतिक दबदबा अब नज़र नहीं आता.
ऐसा लगता है कि अब यह चीज़ गायब हो गई है, क्योंकि राज्य का शासन अभी भी BJP आलाकमान और नौकरशाहों द्वारा ही चलाया जा रहा है. उन्होंने आगे कहा कि इस वजह से BJP के नेताओं और कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में कुछ असंतोष पैदा हो गया है.
सुधांश पंत को मुख्य सचिव से हटाकर भजनलाल ने दिखाया पावर
पिछले नवंबर में, तत्कालीन मुख्य सचिव सुधांश पंत को BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने वापस बुला लिया और उन्हें केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय में सचिव के पद पर तैनात कर दिया. इस कदम से राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई, क्योंकि पंत को उनकी प्रशासनिक क्षमताओं और केंद्र सरकार के साथ उनके अच्छे संबंधों के कारण दिल्ली और जयपुर में BJP सरकारों के बीच एक अहम कड़ी माना जाता था. सूत्रों के अनुसार, पंत को उनकी सेवानिवृत्ति से कुछ महीने पहले ही केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजे जाने का कारण शर्मा सरकार की वह कोशिश थी, जिसके ज़रिए वह यह धारणा बनाना चाहती थी कि CMO (मुख्यमंत्री कार्यालय) ही सारे फ़ैसले ले रहा है, न कि मुख्य सचिव.
मंत्रिमंडल विस्तार में देरी को लेकर सवालों के घेरे में CM भजनलाल
BJP के एक अंदरूनी सूत्र का कहना है कि राज्य सरकार में राजनीतिक नेतृत्व की कमी के कारण लंबे समय से लंबित मंत्रिमंडल विस्तार में देरी हुई है. पिछले साल अगस्त में दिए एक इंटरव्यू में BJP अध्यक्ष मदन राठौर ने कहा था कि मंत्रिमंडल विस्तार जल्द ही होगा. पार्टी के दोनों उपमुख्यमंत्री दीया कुमारी और प्रेम चंद बैरवा को कई महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए हैं. जहां एक ओर दीया कुमारी वित्त, सार्वजनिक निर्माण और पर्यटन विभागों का कार्यभार संभाल रही हैं, वहीं दूसरी ओर बैरवा उच्च शिक्षा, सड़क परिवहन और राजमार्ग, तकनीकी शिक्षा तथा आयुर्वेद/योग/प्राकृतिक चिकित्सा विभागों के प्रभारी बने हुए हैं. अपने-अपने शासनकाल के दौरान, राजे और गहलोत दोनों ने ही वित्त विभाग अपने पास रखा था और राज्य का बजट पेश किया था.
गहलोत-पायलट की खींचतान से बाहर नहीं हुई कांग्रेस?
जहां मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस खुद को BJP सरकार के खिलाफ एकजुट होकर लड़ने वाली एक इकाई के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रहा है, वहीं गहलोत और पूर्व डिप्टी CM सचिन पायलट के बीच एक-दूसरे से आगे निकलने की पुरानी हो चुकी होड़ अभी खत्म होती नहीं दिख रही है.
2023 के चुनावों में कांग्रेस की हार के बाद, गहलोत और पायलट के बीच सत्ता की खींचतान कुछ शांत पड़ती दिखी थी. हालांकि, पार्टी सूत्रों का कहना है कि जैसे-जैसे 2028 के विधानसभा चुनाव करीब आएंगे, उनके बीच की दरार फिर से सामने आ जाएगी.
गहलोत, जिन्होंने अतीत में पार्टी के विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) की संगठनात्मक जिम्मेदारियां संभाली थीं, इस बार राज्य की राजनीति पर ही ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. 2004 में कांग्रेस की हार के बाद, उन्हें दिल्ली और सेवा दल का प्रभारी AICC महासचिव नियुक्त किया गया था. 2017 में, उन्हें गुजरात चुनावों में पार्टी के चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.
राज्य के कुछ जानकारों का कहना है, ‘अब गहलोत स्थानीय मुद्दों में पूरी तरह से शामिल हैं, ताकि वे राज्य कांग्रेस में एक प्रमुख शक्ति केंद्र बने रह सकें.’
वहीं दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ के प्रभारी AICC महासचिव पायलट भी पार्टी के एक प्रमुख युवा चेहरे के तौर पर अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं. वे पार्टी में सुधारों और नई पीढ़ी को आगे लाने की मांग कर रहे हैं. अब उन्हें अप्रैल में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए केरल में AICC का वरिष्ठ पर्यवेक्षक नियुक्त किया गया है.
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