Hyderabad Famous Places : हैदराबाद के दूध बावली इलाके के पुराने ईरानी कैफे में मखलोट की खुशबू, संगमरमर की मेजें और बुजुर्गों की कहानियां शहर की विरासत और तहजीब को आज भी जीवित रखती हैं. शहर के दूध बावली इलाके के पास स्थित ये पुराने ईरानी कैफे केवल ईंट और पत्थर की इमारतें नहीं हैं बल्कि चलती-फिरती विरासत हैं.
मखलोट का स्वाद और उसकी पहचान
अक्सर लोग मखलोट को सिर्फ एक तरह का ईरानी कहवा समझ लेते हैं, लेकिन असल में मखलोट का अर्थ अरबी और फारसी में मिश्रण होता है. यह ईरानी चाय के कड़क डिकोक्शन और कॉफी का अनोखा मेल है, जो अब शहर के गिने-चुने कैफे में ही मिलता है. इसे पीने का सही समय या तो सुबह की पहली किरण के साथ माना जाता है या फिर देर रात जब शहर का शोर थम जाता है. एक प्याली मखलोट में स्वाद के साथ-साथ इतिहास का अहसास भी घुला होता है.
कैफे में जिंदा हैं पुराने किस्से
इन कैफे की सबसे बड़ी खासियत यहां आने वाले बुजुर्ग हैं. अगर कोई कुछ वक्त यहां गुजारे तो उसे ऐसे किस्से सुनने को मिलते हैं जो किसी औपचारिक इतिहास की किताब में दर्ज नहीं हैं. कोई निजामी दौर के खानपान की बारीकियां बताता है तो कोई ईरान से आए अपने पूर्वजों के संघर्ष की दास्तान सुनाता है. इन कहानियों में हैदराबाद की तहजीब और उसके बदलते रंगों की झलक मिलती है.
नई पीढ़ी और पुरानी विरास
आज के दौर में कॉफी कल्चर बड़े ब्रांड्स और फैंसी आउटलेट्स तक सिमटता जा रहा है, लेकिन दूध बावली के ये कैफे अपनी सादगी और पहचान बचाए हुए हैं. नई पीढ़ी के बीच मखलोट का चलन भले कम हो रहा हो, लेकिन पुराने कद्रदान आज भी दूर-दराज से यहां सिर्फ एक प्याली मखलोट और दोस्तों के साथ कुछ लम्हे बिताने पहुंचते हैं. ये गलियां और यहां का मखलोट याद दिलाते हैं कि विरासत केवल इमारतों में नहीं बल्कि उन प्यालियों में भी बसती है जिनका स्वाद पीढ़ियों से नहीं बदला.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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