मध्य प्रदेश में तीन दिनों से चल रही गिद्धों की गणना रविवार को खत्म हो गई। पिछली बार प्रदेशभर में 12 हजार से ज्यादा गिद्ध थे जो इस बार इससे ज्यादा मिले हैं। इंदौर वन मंडल में पिछली बार 86 गिद्ध मिले थे जो इस बार बढ़कर 156 काउंट किए गए हैं। आमजन में यह
टॉवरों पर बैठे गिद्ध।
खास बात यह कि इस बार इंदौर वन मंडल में वन विभाग के अधिकारियों को गिद्धों की गिनती की ट्रेनिंग इंदौर के मास्टर ट्रेनर अजय गडीकर (Ornithologist) ने दी। इसके लिए वन विभाग के कॉन्फ्रेंस हॉल में उन्होंने टीम को एक दिन ट्रेनिंग दी। इसके तहत मौसम विभाग के फॉरकॉस्ट और अनुमान के अनुसार फरवरी के तेज ठंड के तीन दिन 20 से 22 फरवरी चुन लिए गए।

13 फरवरी को इंदौर वन मंडल की टीम ने इंदौर के मास्टर ट्रेनर से सीखी तकनीक।
जानिए क्यों चुने दिन और क्या थी तकनीक दरअसल जहां गिद्धों की बसेरा (ऊंची पहाडी, चट्टान, किले आदि) वहां सुबह 6.30 बजे वन विभाग की टीमें पहुंच गई। इन्हें दो घंटों में इनकी गिनती करने को कहा गया था। इसका बड़ा कारण यह है कि गिद्धों की प्रकृति यह है कि उन्हें सुबह धूप खिलने के बाद गर्मी मिलती है तो उनमें ऊर्जा आती है। इसके बाद वे उड़ते हैं और अगर तापमान अच्छा नहीं रहा तो वे अपने पंख आसानी से फैला नहीं पाते। ऐसे में सुबह का यही दो घंटे का समय होता है जब वे अपने ठिकानों पर बैठे रहते हैं। इस दौरान उनके स्थान पर उनकी गिनती की गई। हालांकि इस बार इस बार 20 फरवरी को पहले दिन कई स्थानों पर बारिश हुई जिससे देर से गिनती हुई। इंदौर वन मंडल में ट्रेचिंग ग्राउण्ड, मोहाडी फॉल, चोरल आदि क्षेत्र में टीमें तीनों दिन समय पर पहुंच गई थी।
गिद्धों की गणना ठंड के दिनों में ही इसलिए की जाती है, क्योंकि सुबह जब तक इनके उड़ने लायक तापमान नहीं हो जाता तब तक वे अपने ठिकानों पर ही मिलते हैं। ऐसे में सुबह ही इनकी गिनती की जाती है और यही संख्या सही साबित होती है।

डिजिटल तरीका भी अपनाया इस बार गणना के लिए डिजिटल तरीका अपनाया गया। इसके लिए “ईपी कलेक्ट फाइव” नामक एप का उपयोग किया गया है। इस तरीके में वन विभाग की टीम को कागज-पेन की जरूरत नहीं पड़ती। इसमें टीम जब गिद्ध के ठिकानों पर पहुंचती है तो वहां की लोकेशन आ जाती है। इसमें समय भी ऑटोमैटिक लोड हो जाता है। टीम वहीं से गिद्धों के फोटो खींचकर एप में अपलोड कर देती है। एप में गिद्धों की संख्या भरनी होती है। इसमें छोटे-बड़े कितने गिद्ध दिखे, कौन सी प्रजाति के दिखे इसकी जानकारी फीड की गई। इससे तुरंत जानकारी फीड होकर कम्पाइल हो जाती है। हालांकि इस दौरान गणना का मेन्युअल तरीका (कागज-पेन) भी जारी था लेकिन इसकी जरूरत ही नहीं पड़ी।

धूप में बैठकर ऊर्जा लेते गिद्ध ताकि ऊंची उड़ान भर सके।
धीरे-धीरे बढ़ती है गिद्धों की संख्या एक्सपर्ट गडीकर ने बताया किएक व्यस्क गिद्ध की जोड़ी सालभर में सिर्फ एक अंडा देती है। ऐसे में इनकी ग्रोथ काफी धीरे होती है। इसके लिए इनका प्रोटेक्शन जरूरी है। इनके बसेरे के स्थान सुरक्षित रखना होते हैं। 1990 के दशक में देशभर में गिद्ध अधिसंख्य थे, लेकिन अब देशभर में ये हजारों में ही रह गए हैं। हालांकि इजिप्शन प्रजाति के गिद्ध कई बार दो अंडे भी देती है।

इसलिए अब बढ़ रही है संख्या
- वन विभाग द्वारा इनके नेस्ट की मॉनिटरिंग की जा रही है और उन्हें प्रोटेक्शन दिया जा रहा है।
- जानलेवा पेस्टीसाइड डाइक्लोफिनिक पर प्रतिबंध लगना भी है। पहले इस कारण इनकी संख्या काफी कम हो गई थी। पेस्टीसाइड मवेशियों पर लगाई जाती थी। ऐसे में जब भी मवेशी की मौत होती थी तो गिद्ध भोजन के रूप में उसे लेते थे और उनकी मौत हो जाती थी। अब यह प्रतिबंधित होने से प्रदेश से गिद्ध विलुप्त होने की चिंता खत्म हो गई है।
बदल भी रही है गिद्धों की लाइफ स्टाइल

प्रदेश में कई स्थानों पर वन विभाग की टीम ने टॉवर पर बैठे स्थिति में कैप्चर किया।
इस बार रोचक तथ्य यह भी रहा कि गिद्धों के बसेरे आमतौर पर ऊंचाइयों पर रहते हैं ताकि इनके अंडे भी सुरक्षित रहे, लेकिन जिले के बाहर या सीमावर्ती क्षेत्रों में अब बड़े-बड़े मोबाइल से टॉवरों पर भी ये रात से लेकर धूप खिलने तक देखे गए हैं। प्रदेश के कई स्थानों पर वन विभाग की टीम ने ऐसे विजुअल्स भी जुटाए हैं।

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पन्ना में तीन दिवसीय गिद्ध गणना में मिले 1127 गिद्ध

पन्ना जिले में दक्षिण पन्ना वनमंडल में हाल ही में संपन्न हुई तीन दिवसीय गिद्ध गणना 2026 में 1127 गिद्ध दर्ज किए गए हैं। यह संख्या पिछले दशकों में सर्वाधिक है और संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता मानी जा रही है। आंकड़ों के अनुसार 2021 में 614 गिद्ध, 2024 में 648 और 2025 में 762 गिद्ध दर्ज किए गए थे। इस साल यह संख्या बढ़कर 1127 हो गई है, जो लगातार बढ़ती आबादी का संकेत है।पूरी खबर पढ़ें
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