Hyderabad Nizam Story : पोचारम के जंगल, हैदराबाद के छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान का शिकारगाह, अब संरक्षित वन क्षेत्र है जहां तेंदुए, भालू और प्रवासी पक्षी बसे हैं. इतिहास और रोमांच का संगम यहां मिलता है. दक्कन इतिहास के जानकार ज़ाहिद सरकार बताते हैं कि छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान अपनी निशानेबाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर थे. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उन्होंने पोचारम के घने जंगलों में अकेले 33 बाघों का शिकार किया था.
दक्कन इतिहास के जानकार ज़ाहिद सरकार बताते हैं कि छठे निज़ाम मीर महबूब अली खान अपनी निशानेबाजी के लिए दुनिया भर में मशहूर थे. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उन्होंने पोचारम के घने जंगलों में अकेले 33 बाघों का शिकार किया था. उनकी इसी बेखौफ निशानेबाजी के चलते उन्हें तीस मार खां की उपाधि मिली, जो आज भी भारतीय मुहावरों में बहादुरी के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल की जाती है. उनके लिए शिकार केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि यह एक शाही जुनून था, जिसके लिए वे महीनों तक पोचारम की पहाड़ियों और नदियों के किनारे डेरा डालते थे.
खंडहर बना शाही विश्राम स्थल
पोचारम के बीचों बीच आज भी वर्ष 1918 में बना एक प्राचीन रेस्ट हाउस खड़ा है, जो अब खंडहर में तब्दील हो चुका है. निज़ाम के दौर में यह इमारत ऐशो आराम और रणनीति का केंद्र हुआ करती थी. पोचारम झील के किनारे स्थित यह स्थल कभी शिकार अभियानों की योजना बनाने का अहम ठिकाना था. इसी झील का निर्माण भी निज़ाम काल में सिंचाई के उद्देश्य से किया गया था, जो आज प्रवासी पक्षियों और मगरमच्छों का सुरक्षित बसेरा बन चुकी है.
शिकारगाह से अभयारण्य तक का सफर
समय बदला और आज वही शिकारगाह एक संरक्षित वन क्षेत्र के रूप में जानी जाती है. लगभग 130 वर्ग किलोमीटर में फैला यह इलाका अब बाघों के लिए नहीं, बल्कि तेंदुओं के गढ़ के रूप में पहचाना जाता है. यहां सुस्त भालू, नीलगाय, जंगली सूअर और चिंकारा जैसे वन्यजीव खुलेआम घूमते नजर आते हैं. पोचारम केवल एक जंगल नहीं, बल्कि दक्कन के उस दौर का जीवंत गवाह है, जब सत्ता के फैसले बंदूकों की नली और जंगल की खामोशी के बीच तय होते थे.
हैदराबाद से करीब 110 से 120 किलोमीटर दूर स्थित यह क्षेत्र आज उन लोगों के लिए जन्नत बन चुका है, जो इतिहास और रोमांच को एक साथ महसूस करना चाहते हैं. यहां की इको टूरिज्म सफारी और घने जंगलों के बीच निज़ाम के पदचिन्हों को खोजना पर्यटकों के लिए एक अलग ही अनुभव देता है. पोचारम के जंगल आज भी अपने भीतर दक्कन की शाही विरासत और रहस्यमयी कहानियों को समेटे हुए हैं.
नोट- इस लेख का उद्देश्य ऐसे किसी शौक को बढ़ावा देना नहीं है. इस लेख से हम लोगों तक इतिहास की बात लाना चाहते हैं.
About the Author
नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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