Avatar Film Shooting : जेम्स कैमरून की अवतार ने 2.9 बिलियन डॉलर कमाए, वेटा डिजिटल के वीएफएक्स और मोशन कैप्चर स्टूडियो ने पेंडोरा की दुनिया स्टूडियो में ही रची, तकनीक ने सिनेमा को नया रूप दिया. अवतार की शूटिंग पारंपरिक फिल्मों की तरह नहीं की गई थी. इसके लिए वेटा डिजिटल नाम की मशहूर वीएफएक्स कंपनी ने एक पूरी वर्चुअल दुनिया तैयार की थी.
अवतार की शूटिंग पारंपरिक फिल्मों की तरह नहीं की गई थी. इसके लिए वेटा डिजिटल नाम की मशहूर वीएफएक्स कंपनी ने एक पूरी वर्चुअल दुनिया तैयार की थी. इस तकनीक को परफॉर्मेंस कैप्चर कहा जाता है. इसमें कलाकार एक विशेष स्टूडियो में अभिनय करते हैं और उनके हाव-भाव, शरीर की हरकतें और चेहरे के भाव डिजिटल रूप में रिकॉर्ड किए जाते हैं. बाद में इन्हीं रिकॉर्डेड मूवमेंट्स को कंप्यूटर की मदद से एलियन जैसे किरदारों में बदल दिया जाता है, जो स्क्रीन पर पूरी तरह वास्तविक नजर आते हैं.
मोशन कैप्चर स्टूडियो की जटिल प्रक्रिया
रामोजी फिल्म सिटी में स्थित मोशन कैप्चर स्टूडियो से जुड़ी जानकारी के अनुसार यह प्रक्रिया बेहद जटिल और तकनीकी होती है. शूटिंग के दौरान कलाकारों को एक खास नीले या गहरे रंग के कमरे में काम करना होता है. उन्हें काले रंग का विशेष सूट पहनाया जाता है, जिस पर दर्जनों छोटे-छोटे मोशन कैप्चर सेंसर और चिप्स लगे होते हैं. ये सेंसर कलाकार के शरीर की हर छोटी से छोटी हरकत को रिकॉर्ड करते हैं, ताकि बाद में उसे डिजिटल कैरेक्टर में सटीक रूप से बदला जा सके.
360 डिग्री कैमरों की भूमिका
मोशन कैप्चर स्टूडियो में चारों तरफ 360 डिग्री कैमरे लगाए जाते हैं. ये कैमरे कलाकार की हर मूवमेंट को अलग-अलग एंगल से कैद करते हैं. चाहे हाथ उठाने की हल्की सी हरकत हो या चेहरे पर आने वाला भाव, सब कुछ रिकॉर्ड किया जाता है. इसी तकनीक की वजह से अवतार के किरदार इतने जीवंत और वास्तविक नजर आए, मानो वे सचमुच किसी दूसरी दुनिया से आए हों.
जब कुर्सी बन गई चट्टान
इस तकनीक का सबसे रोचक पहलू यह है कि शूटिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाली चीजें असल में बहुत साधारण होती हैं. उदाहरण के तौर पर, जिस कुर्सी पर बैठकर या जिसे पकड़कर एक्टर अभिनय करता है, वही कुर्सी स्क्रीन पर एक विशाल चट्टान में बदल जाती है. कलाकार को पहले से यह कल्पना करनी होती है कि वह किस तरह के भारी या विशाल ऑब्जेक्ट के साथ परफॉर्म कर रहा है. बाद में वीएफएक्स की मदद से उस साधारण वस्तु को एक भव्य दृश्य में तब्दील कर दिया जाता है.
क्रोमा की और वीएफएक्स की बढ़ती ताकत
फिल्म निर्माण में हरे और नीले रंग के पर्दों का इस्तेमाल आम बात है, जिसे क्रोमा की कहा जाता है. इसकी मदद से किसी भी बैकग्राउंड को बाद में बदला जा सकता है. यही वजह है कि आज कोई भी कलाकार स्टूडियो में खड़े होकर लंदन की सड़कों, अंतरिक्ष या बादलों के बीच खुद को दिखा सकता है. भारतीय सिनेमा में भी अब बड़े पैमाने पर वीएफएक्स का इस्तेमाल हो रहा है. आधुनिक तकनीक ने यह साबित कर दिया है कि जो चीजें असल में मौजूद नहीं हैं, वे भी पर्दे पर पूरी तरह वास्तविक और जीवंत दिखाई दे सकती हैं.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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