इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन को लेकर जनमानस में संशय की स्थिति है कि 2 मार्च को हो या 3 मार्च को। शास्त्रीय प्रमाणों एवं ग्रहण नियम के सूक्ष्म विचार के आधार पर निर्णय स्पष्ट किया गया है।
इस वर्ष प्रतिपदा वृद्धिगामिनी है। सामान्यतः नियम के अनुसार 3 मार्च की प्रदोष बेला में होलिका दहन अपेक्षित था, परंतु चन्द्रग्रहण होने के कारण ग्रहण नियम लागू होगा।
शास्त्र में स्पष्ट निर्देश है —
अत्र चेच्चंद्र ग्रहणं तदा ततोऽ र्वार्ड्.निशि भद्रावर्जपूर्णिमायां होलिकादीपनम्।
तथा —
अथ परेऽह्णि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्वदिने भद्रावर्ज रात्रिचतुर्थ्य यामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्य।
अर्थात् यदि चन्द्रग्रहण हो तो भद्रा रहित पूर्णिमा में रात्रि में होलिका दहन किया जाए।
यदि अगले दिन ग्रस्तोदय ग्रहण हो तो पूर्व दिवस में भद्रा त्यागकर रात्रि के चतुर्थ याम अथवा विष्टिपुच्छ काल में होलिका दहन करना चाहिए।
इसी आधार पर इस वर्ष होलिका दहन का श्रेष्ठ समय
2 मार्च रात्रि 29:29 (अर्थात 3 मार्च प्रातः 5:29 बजे) से लेकर सूर्योदय पूर्व लगभग 6:30 बजे तक। यह काल ग्रहण नियम से शास्त्रसम्मत शुभ मुहूर्त है।
विशेष निर्देश
देश के जिन क्षेत्रों में ग्रस्तोदय ग्रहण एक अँगुल से कम है, वहाँ स्थानीय परंपरा अनुसार 3 मार्च की प्रदोष बेला में भी होलिका दहन किया जा सकता है। लेकिन उत्तराखंड समेत समस्त उत्तर और पूर्वी भारत में 2 मार्च रात्रि 29:29 (अर्थात 3 मार्च प्रातः 5:29 बजे )से लेकर सूर्योदय पूर्व लगभग 6:30 बजे तक होलिका दहन करना मंगलकारी है
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शास्त्र और परंपरा के समन्वय से ही धर्म निर्णय सिद्ध होता है
मुहूर्त शुद्ध — फल सिद्ध।
आचार्य पवन पाठक
संपादक, श्री बुद्धि बल्लभ पंचांग
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