कोलकाता में आयोजित विश्व स्तरीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने वाली सीमा युवाओं के लिए उदाहरण बनीं हैं। चंबा की पहाड़ियों में पली-बढ़ी सीमा का जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। 12 वर्ष की उम्र में पिता का साया उठ गया। परिवार की जिम्मेदारियां कंधों पर आ गईं, लेकिन सपनों की दौड़ कभी नहीं थमी।
पढ़ाई के साथ पशु चराने की जिम्मेदारी निभाते हुए सीमा गांव की पगडंडियों पर नंगे पांव दौड़ती रहीं। अभ्यास के लिए न आधुनिक ट्रैक था, न सुविधाएं। सीमित संसाधनों के बीच उसने खुद को मजबूत बनाया। कठिन हालातों ने उसके हौसले को नहीं तोड़ा, बल्कि हर दिन उसे और मजबूत किया। मां का साथ और उनका विश्वास सीमा की सबसे बड़ी ताकत बना। आर्थिक तंगी के बावजूद मां ने बेटी के सपनों को जिंदा रखा।
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