चंडीगढ़ | कम वेतन पर दशकों तक काम लेने और फिर नौकरी की सुरक्षा से इनकार करने के चलन पर पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इसे संस्थागत शोषण बताया। जस्टिस संदीप मोदगिल ने कहा कि ऐसा आचरण निष्पक्षता, समानता और सामाजिक न्याय की मूल भावना पर सीधा प्रहार करता है। दरअसल, पार्ट टाइम स्वीपर के रूप में कार्यरत बीर सिंह की तरफ से याचिका में कहा गया कि लगभग चार दशकों तक किया गया काम न तो अस्थायी था और न ही आकस्मिक, बल्कि स्थायी, अनिवार्य और संस्थान के संचालन के लिए जरूरी था। बावजूद इसके उसे स्थायी नहीं किया गया। अब सुनवाई 31 जनवरी को है। हिसार स्थित गुरु जंभेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में कार्यरत टीचिंग एसोसिएट्स को असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियमित करने की मांग को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। बता दें कि जीजेयू के 24 कर्मचारियों का हाईकोर्ट में 10 साल से केस चल रहा है। जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाने का काम अत्यंत योग्य और सक्षम व्यक्तियों द्वारा किया जाना चाहिए, क्योंकि उन्हें स्नातक और स्नातकोत्तर छात्रों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी होती है। हाईकोर्ट ने टीचिंग एसोसिएट्स की इस दलील को खारिज कर दिया कि चयन प्रक्रिया महज एक औपचारिकता है, जिसे नजर अंदाज कर नियमितीकरण किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ताओं को ‘वॉक-इन-इंटरव्यू’ के जरिए टीचिंग एसोसिएट के रूप में सीमित अवधि के लिए, एकमुश्त वेतन पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति अस्थायी चयन समितियों द्वारा की गई थी और कुलपति से अनुमोदन लिया गया था। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति पत्रों में स्पष्ट लिखा था कि ये नियुक्तियां संविदा आधार पर हैं और नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं होगा। 40 साल काम, फिर भी पक्की नौकरी नहीं; राज्य करे विचार चयन प्रक्रिया महज एक औपचारिकता है, जिसे नजर अंदाज कर नियमितीकरण किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ताओं को ‘वॉक-इन-इंटरव्यू’ के जरिए टीचिंग एसोसिएट के रूप में सीमित अवधि के लिए, एकमुश्त वेतन पर नियुक्त किया गया था। उनकी नियुक्ति अस्थायी चयन समितियों द्वारा की गई थी और कुलपति से अनुमोदन लिया गया था। कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति पत्रों में स्पष्ट लिखा था कि ये नियुक्तियां संविदा आधार पर हैं और नियमितीकरण का कोई अधिकार नहीं होगा।
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