गिरिडीह जिले के जमुआ प्रखंड स्थित खरगडीहा में परम संत सद्गुरु लंगेश्वरी बाबा उर्फ लंगटा बाबा की समाधि 116 वर्षों से आस्था, इतिहास और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बनी हुई है। हर वर्ष पौष पूर्णिमा के अवसर पर यहां भव्य समाधि पर्व और मेले का आयोजन किया जात
परम संत सद्गुरु लंगेश्वरी बाबा उर्फ लंगटा बाबा
आज समाधि पर्व श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाया गया। मौके पर चादरपोशी, भंडारा और महालंगर का आयोजन हुआ। सुबह 3:15 बजे जमुआ थाना प्रभारी विभूति देव ने बाबा की समाधि पर पहली चादर चढ़ाई। इसके बाद खोरीमहुआ के एसडीएम अनिमेष रंजन, एसडीपीओ राजेंद्र प्रसाद और जमुआ पुलिस निरीक्षक ने भी चादरपोशी कर श्रद्धांजलि अर्पित की। औपचारिक कार्यक्रम के बाद श्रद्धालुओं के लिए समाधि स्थल के द्वार खोल दिए गए।
हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल बना समाधि स्थल
निर्धारित परंपरा के अनुसार सुबह 3:30 बजे से दोपहर 1 बजे तक हिंदू समाज के श्रद्धालुओं ने चादरपोशी की, जबकि दोपहर 1:15 बजे से शाम 5 बजे तक मुस्लिम समाज के लोगों ने बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाई। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, 1870 के दशक में नागा साधुओं के साथ आए एक वृद्ध संत को इस क्षेत्र से गहरा आध्यात्मिक लगाव हो गया था। बाद में यही संत लंगेश्वरी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हुए।

लंगटा बाबा ने पौष पूर्णिमा के दिन महा समाधि ली। जिसे विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन अपनाया और 1910 में पौष पूर्णिमा के दिन महा समाधि ली। उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम समुदायों में मतभेद हुए, लेकिन अंततः दोनों धर्मों की परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। तभी से यह समाधि स्थल सांप्रदायिक सौहार्द और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक बन गया।
भंडारा, महालंगर और विश्वास की परंपरा आज भी जीवंत
मान्यता है कि लंगटा बाबा में अद्भुत आध्यात्मिक शक्तियां थीं। उन्होंने चर्म रोगों से पीड़ित लोगों का उपचार किया और प्लेग जैसी महामारी के दौरान निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा की। इसी कारण लोग उन्हें अवतारी पुरुष मानने लगे। हर साल पौष पूर्णिमा पर लगने वाले मेले में श्रद्धालु बाबा की समाधि पर चादर चढ़ाकर सुख-शांति, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की कामना करते हैं।

यहां महालंगर में लाखों लोग बिना भेदभाव एक साथ पंगत में बैठकर भोजन करते हैं।
मन्नत पूरी होने पर भंडारा और सेवा कार्य भी कराए जाते हैं। महालंगर में लाखों लोग बिना भेदभाव एक साथ पंगत में बैठकर भोजन करते हैं। बाबा का संदेश ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ आज भी समाज को जोड़ने की प्रेरणा देता है। खरगडीहा का यह समाधि स्थल न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि मानवता और भाईचारे की जीवंत मिसाल बना हुआ है।
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