1961 बैच का कर्नाटका कैडर का आईपीएस अधिकारी की पहचान एक बेहद ईमानदार और नियमों के पक्के अधिकारी के रूप में थी. जुलाई 1996 में उन्हें सीबीआई का डायरेक्टर नियुक्त किया गया. वह केवल 11 महीने तक ही इस पद पर रहे, लेकिन उन 11 महीनों में उन्होंने जो किया, उसने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी. उसकी कहानी आज भी आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव भुगत रहे हैं. उनसे पहले सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’ कहा जाता था, लेकिन जोगिंदर सिंह ने उस तोते को उड़ना और शिकार करना सिखा दिया.
31 जुलाई 1996 से 30 जून 1997 तक सीबीआई के डायरेक्टर के पद पर रहे जोगिंदर सिंह ने सीबीआई को नई ऊंचाई दी. जोगिंदर सिंह के कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि थी बिहार के 950 करोड़ रुपये का चारा घोटाला में लालू प्रसाद यादव को इस्तीफा देना और फिर बाद में जेल की यात्रा कराना. लालू प्रसाद यादव उस समय राजनीति के शिखर पर थे. जोगिंदर सिंह ने बिना किसी राजनीतिक दबाव के लालू यादव के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की मंजूरी देकर, उनको धरातल पर ला दिया.
एक बार जब उनसे पूछा गया कि क्या आप पर दबाव है? तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा था, ‘कानून अपना काम करेगा.’ उनके इसी रुख का नतीजा था कि उस समय भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार हुआ था, जब किसी सिटिंग सीएम को इस्तीफा दिलाकर सीबीआई ने सलाखों के पीछे पहुंचाया.
जोगिंदर सिंह के कार्यकाल के दौरान देश के प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल थे. गुजराल साहब अपनी सॉफ्ट डिप्लोमेसी के लिए जाने जाते थे, जबकि जोगिंदर सिंह अपनी हार्ड इन्वेस्टिगेशन के लिए.
कहा जाता है कि पीएम गुजराल और जोगिंदर सिंह के बीच रिश्ते कभी सहज नहीं रहे. उस समय के प्रधानमंत्री चाहते थे कि गठबंधन सरकार के सहयोगियों के खिलाफ जांच में थोड़ी नरमी बरती जाए ताकि सरकार को खतरा न हो. लेकिन जोगिंदर सिंह ने चारा घोटाला, यूरिया घोटाला और जेएमएम रिश्वत कांड जैसी फाइलों को फिर से खोल दिया. यही वजह थी कि जून 1997 में उन्हें अचानक पद से हटाकर गृह मंत्रालय में ओएसडी बना दिया गया. उनकी विदाई बेहद नाटकीय थी, जिसका जिक्र उन्होंने बाद में अपनी किताबों में किया.
जोगिंदर सिंह के रडार पर कौन-कौन नेता थे?
- लालू प्रसाद यादव: चारा घोटाले में मुख्य आरोपी.
- पीवी नरसिम्हा राव: पूर्व प्रधानमंत्री, जिन्हें जेएमएम रिश्वत कांड और अन्य मामलों में अदालतों के चक्कर काटने पड़े.
- सतीश शर्मा: पेट्रोल पंप आवंटन मामले में चर्चा में रहे.
- प्रकाश सिंह बादल: पंजाब की राजनीति के दिग्गज.
जोगिंदर सिंह ने रिटायरमेंट के बाद कई किताबें लिखीं, जिनमें Inside CBI, The Secrets of CBI और Without Fear or Favour प्रमुख हैं. इन किताबों में उन्होंने चारा घोटाले के उन अनछुए पहलुओं का जिक्र किया है जिन्हें सरकार दबाना चाहती थी.
उन्होंने विस्तार से बताया कि कैसे बिहार के अधिकारियों और नेताओं ने मिलकर सरकारी खजाना लूटा. उन्होंने बोफोर्स का सच भी बताया कि कैसे कई फाइलें राजनीतिक कारणों से सालों तक धूल फांकती रहीं. उन्होंने अपनी किताबों में साफ लिखा कि कैसे एक प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) जांच को प्रभावित करने की कोशिश करता है.
सीबीआई का गठन 1963 में हुआ. इसके बाद से सीबीआई के पास चारा घोटाला, बोफोर्स घोटाला, विजय माल्या के 20 बैंकों से करीब 9,000 करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज चुकाने का मामला, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी से जुड़ा 13 हजार करोड़ रुपए का पंजाब नेशनल बैंक घोटाला, रॉबर्ट वाड्रा और बीएस हुड्डा जमीन सौदा मामला, 2010 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस घोटाला, 2004-09 के बीच अवैध रूप से कोयले के ब्लॉक आवंटन के कारण 1.86 लाख करोड़ रुपए कोयला घोटाला, वीवीआइपी हेलिकॉप्टर घोटाला, आईआरसीटीसी घोटाला, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया घूस कांड, कोयला खदान आवंटन में घोटाले की जांच, सरकारी भर्तियों के लिए घूस का मामला, शारदा चिंटफंड, रोज वैली और नारदा घोटाले तक कई केस सीबीआई ने हैंडल किए.
3 फरवरी 2017 को 77 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन सीबीआई को एक स्वायत्त संस्था बनाने की जो नींव उन्होंने रखी थी, वह आज भी अधिकारियों को प्रेरित करती है. वह एक ऐसे अफसर थे जिन्होंने साबित किया कि अगर इरादे फौलादी हों तो एक अकेला इंसान भी पूरे सिस्टम से लोहा ले सकता है. आईपीएस अधिकारियों में एक ऐसा भी नाम है, जो हमलोगों के बीच अब तो नहीं हैं, लेकिन उनके काम करने के तरीकों को वर्षों तक याद किया जाएगा.सीबीआई से जुड़े लोग भी मानते हैं कि हाल के वर्षों में एजेंसी के अंदर हुए विवाद से सीबीआई की छवि काफी प्रभावित नहीं हुई होती अगर जोंगिदर सिंह जैसा ईमानदार अधिकारी होता.
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