कितने घंटों की ठंडक जरूरी
देहरादून कृषि एक्सपर्ट मुकेश कैंतुरा बताते हैं कि उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में इस साल मौसम के बदले मिजाज ने सेब बागवानों की नींद उड़ा दी है. दिसंबर और जनवरी का समय, जो अमूमन बर्फ की सफेद चादर से ढका रहता था, इस बार सूखा बीत रहा है. उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पिथौरागढ़ और नैनीताल के ऊंचाई वाले इलाकों में पर्याप्त हिमपात न होने से सेब के उत्पादन पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं. मुकेश बताते हैं कि सेब की अच्छी फसल के लिए सबसे अहम कारक ‘चिलिंग ऑवर्स’ (ठंडे घंटे) होते हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, अच्छी गुणवत्ता के सेब के लिए पेड़ों को 0 से 7 डिग्री सेल्सियस के बीच लगभग 800 से 1200 घंटों की ठंडक की आवश्यकता होती है. बर्फबारी न होने और खिली धूप के कारण तापमान सामान्य से अधिक बना हुआ है, जिससे यह प्रक्रिया पूरी नहीं हो पा रही है. अगर चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं हुए, तो पेड़ों में कलियां कम बनेंगी और फलों का आकार और स्वाद भी प्रभावित होगा.
प्री-मैच्योर फ्लावरिंग
मुकेश का कहना है कि बारिश और बर्फबारी में जमीन-आसमान का अंतर होता है. बर्फ धीरे-धीरे पिघलती है, जिससे पानी जमीन की गहराई तक जाता है और मिट्टी में लंबे समय तक नमी बनी रहती है. यही नमी मार्च-अप्रैल के महीनों में पेड़ों के विकास में काम आती है. इसके विपरीत, बारिश का पानी तेजी से बह जाता है और मिट्टी की ऊपरी सतह तक ही सीमित रहता है, जो सेब के बागों के लिए पर्याप्त नहीं है. इससे ‘प्री-मैच्योर फ्लावरिंग’ का खतरा भी होता था. ऐसे में तापमान में असामान्य बढ़ोतरी के कारण पेड़ों के चक्र में बदलाव आने की आशंका है. अगर तापमान इसी तरह ऊंचा रहा, तो पेड़ों में समय से पहले फूल (फ्लावरिंग) आ सकते हैं.
सेब की ‘शेल्फ लाइफ’
कृषि वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगले 15 दिनों में भारी हिमपात नहीं होता है, तो इस वर्ष सेब का उत्पादन आधा हो सकता है. फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में होने वाली ओलावृष्टि या पाला इन कोमल फूलों को पूरी तरह नष्ट कर सकता है. उत्तराखंड की पहाड़ी अर्थव्यवस्था में सेब का बड़ा योगदान है. उत्तरकाशी के हर्षिल और चमोली के ऊंचाई वाले क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन का सीधा असर उनकी आजीविका पर पड़ रहा है. बर्फबारी की कमी से न केवल पैदावार घटेगी, बल्कि सेब की ‘शेल्फ लाइफ’ और बाजार मूल्य पर भी बुरा असर पड़ेगा.
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