धर्मशाला की एक छह वर्षीय बच्ची डॉक्टरों और एंबुलेंस कर्मियों की हड़ताल के कारण समय पर इलाज न मिलने से कोमा में चली गई है। पहली कक्षा की छात्रा रचना की टांग में मामूली चोट के बाद संक्रमण फैल गया, जिससे उसकी टांग सड़ने की नौबत आ गई है। यह घटना शिमला में डॉक्टर-मरीज मारपीट के बाद शुरू हुई हड़ताल के दौरान हुई। बच्ची के पिता जादे बेलभरिया माहौत ने बताया कि 26 दिसंबर को रचना स्कूल से घर लौटी और उसकी टांग में तेज दर्द हुआ। वे उसे तुरंत जोनल अस्पताल धर्मशाला ले गए। उस दिन शिमला की घटना के विरोध में डॉक्टर हड़ताल पर थे। इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टर ने एक्स-रे देखने के बाद कहा कि फ्रैक्चर नहीं है और पेन किलर लेने की सलाह दी। रचना को पूरी रात दर्द रहा। अगले दिन जब वे फिर अस्पताल पहुंचे, तो उन्हें बताया गया कि ऑर्थोपेडिक डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं और बच्ची को टांडा मेडिकल कॉलेज ले जाने की सलाह दी गई।
टैक्सी किराए पर लेकर पहुंचाया अस्पताल बच्ची को टांडा मेडिकल कॉलेज ले जाने के प्रयास में पता चला कि एंबुलेंस स्टाफ भी हड़ताल पर था। मजबूरन, पिता ने टैक्सी किराए पर ली और बच्ची को टांडा पहुंचाया। तब तक काफी देर हो चुकी थी। टांडा में डॉक्टरों ने बताया कि टांग में जख्म के साथ संक्रमण (इन्फेक्शन) फैल चुका है। बच्ची का ऑपरेशन किया गया, लेकिन उसकी हालत में सुधार होने के बजाय बिगड़ती चली गई और वह कोमा में चली गई। फिलहाल रचना आईसीयू में भर्ती है। बच्ची के पिता, जो एक प्रवासी मजदूर हैं, इलाज के लिए अब तक 60 हजार रुपए का कर्ज ले चुके हैं। प्रशासन और कुछ संस्थाओं ने बच्ची के इलाज के लिए मदद का हाथ बढ़ाया है, लेकिन इलाज का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। डीसी कांगड़ा ने दिए मुफ्त इलाज के आदेश रेडक्रास सोसाइटी की ओर से 12 हजार, इनर व्हील क्लब की ओर से 16 हजार 500 तथा स्कूल टीचर ने 6 हजार रुपए की सहायता की। इसके बावजूद पिता पर 60 हजार रुपए का कर्ज चढ़ चुका है। 7 बच्चों के पिता के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं। हालांकि, अब डीसी कांगड़ा हेमराज बैरवा ने टांडा मेडिकल कॉलेज के एमएस को बच्ची का मुफ्त इलाज सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। सिस्टम की पोल खोलता स्कूल जिस स्कूल में रचना और उसकी दो बहनें रुकसाना और दक्षणा पढ़ती हैं, उसकी हालत भी सिस्टम की बदहाली की गवाही देती है।
हैरानी की बात यह है कि स्कूल धर्मशाला सचिवालय और डिप्टी डायरेक्टर एजुकेशन ऑफिस से महज 100 गज दूर है, लेकिन बच्चों के आने-जाने के लिए पक्का रास्ता नहीं है।
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