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धनबाद के झरिया क्षेत्र अंतर्गत फुलारीबाग के समीप पिछले 15 वर्षों से मूर्ति निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय अनुभवी मूर्तिकार मंटू पाल मंटु पॉल इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं. मां सरस्वती की मूर्ति बनाना उनके लिए केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है
बसंत पंचमी का पावन पर्व, जो विद्या और ज्ञान की देवी मां सरस्वती की आराधना के लिए जाना जाता है. इस वर्ष 2 फरवरी को पूरे श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा. धनबाद में इस पर्व को लेकर खासा उत्साह देखा जा रहा है.शहर और आसपास के इलाकों में पूजा समितियां तैयारियों में जुटी हैं, वहीं मूर्तिकारों के यहां मां सरस्वती की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम पूरे जोश के साथ चल रहा है.
धनबाद के झरिया क्षेत्र अंतर्गत फुलारीबाग के समीप पिछले 15 वर्षों से मूर्ति निर्माण के क्षेत्र में सक्रिय अनुभवी मूर्तिकार मंटू पाल मंटु पॉल इस परंपरा को जीवंत बनाए हुए हैं. मां सरस्वती की मूर्ति बनाना उनके लिए केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है. मिट्टी को आकार देते समय उनके मन में भक्ति और श्रद्धा का भाव रहता है, जो उनकी प्रतिमाओं में साफ झलकता है.
मूर्ति बनाने में काली मिट्टी का उपयोग
मंटू पाल विशेष रूप से गंगा की पवित्र मिट्टी के साथ-साथ स्थानीय पीली और काली मिट्टी का उपयोग करते हैं. उनका मानना है कि गंगा की मिट्टी से बनी प्रतिमाओं में एक अलग ही दिव्यता और पवित्रता का आभास होता है. इसके लिए मिट्टी कोलकाता के कालीघाट से मंगाई जाती है.जबकि स्थानीय मिट्टी जामाडोबा भौरा और बोरगढ़ जैसे इलाकों से लाई जाती है.सरस्वती पूजा के लिए मूर्ति निर्माण का कार्य लगभग दो महीने पहले शुरू हो जाता है. मंटू पाल बताते हैं कि एक मूर्ति को पूरी तरह तैयार करने में कई चरण होते हैं. इसमें छह कारीगर मिलकर काम करते हैं. ढांचे से लेकर अंतिम सजावट तक हर प्रक्रिया में बारीकी और धैर्य की आवश्यकता होती है. पूजा में अब मात्र 12 से 13 दिन शेष हैं, ऐसे में वे और उनकी टीम दिन-रात मेहनत कर रही है.
एक सीजन में 200 प्रतिमाओं का निर्माण
एक सीजन में मंटू पाल लगभग 200 प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं. इस पूरे कार्य में करीब 50 हजार रुपये का खर्च आता है. प्रतिमाओं के आकार और डिज़ाइन के अनुसार उनकी कीमत 1000 रुपये से लेकर 4000 रुपये तक होती है. इससे न केवल उन्हें आर्थिक स्थिरता मिलती है बल्कि कई अन्य कारीगरों को भी रोजगार प्राप्त होता है.मूर्ति निर्माण में लगने वाली सामग्री की जानकारी देते हुए मंटू पाल बताते हैं कि एक सीजन में लगभग 10 पीस बांस 20 बोरी बालू, करीब 40 किलो बिचली एक मन और लगभग 50 जूट के बोरे की खपत होती है. बिचली का उपयोग मां सरस्वती के हाथ, पांव और आकृति को मजबूत व सजीव रूप देने में किया जाता है.मंटू पाल मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं. उम्र बढ़ने के बावजूद वे आज भी पूरे समर्पण के साथ इस कला से जुड़े हुए हैं और इसी से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं. उनका कहना है कि मां सरस्वती की कृपा से वे किसी भी प्रकार की प्रतिमा या व्यक्ति का हूबहू स्टेच्यू तैयार करने में सक्षम हैं.
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