राजपाल यादव ने फिल्म “अता पता लापता” बनाने के लिए 5 करोड़ रुपए लिए थे और 20 साल बाद उन पर 9 करोड़ का कर्ज हुआ. करोड़ों का कर्ज जब समय पर नहीं चुकाया जा सका, तो कानूनी कार्रवाई के चलते उन्हें जेल जाना पड़ा. इस मामले में ‘उधार की संस्कृति’ का आईना नजर आया है, जिसमें आज का समाज फंसा हुआ है.
मासिक किश्तों में उलझते जा रहे हैं लोग
हमारे देश में सिर्फ राजपाल यादव जैसे एक्टर ही नहीं, बल्कि आज मध्यमवर्ग का एक बड़ा हिस्सा मासिक किश्तों यानी EMI के अंतहीन चक्र में उलझा हुआ है. लोग अपनी मौजूदा आय से कहीं ज्यादा खर्च करने के लिए क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन का सहारा ले रहे हैं. जब पुराने लोग इस स्थिति पर अपनी राय देते हैं, तो पुराने वक्त को याद करते हैं. जब इस तरह के कर्ज में इंसान फंसता चला जाता था.
देश की अर्थव्यवस्था की रीड माना जाने वाला मध्यमवर्ग मासिक किस्त के चलते कर्ज के जाल में फंसता जा रहा है. अब स्मार्ट फोन, घर, गाड़ी ही नहीं, फ्लाइट टिकट भी ईएमआई पर लिए जा रहे हैं. दस्तावेजी कार्रवाई के बिना ही “बाय नाव पे लेटर” के तहत पर्सनल लोन, प्लेटफॉर्म लोन देते हैं और फिर उन्हें चुकाने में आम आदमी के पसीने छूट जाते हैं.
कमाई कम, कर्ज का तनाव ज्यादा
मासिक किस्त भले ही छोटा अमाउंट हो, लेकिन लंबे समय तक ज्यादा इंट्रेस्ट पर चुकाना बेहद मुश्किल होता है और यह रकम अगर ज्यादा होती है, तो महीने का खर्च बहुत मुश्किल होता है. इस बीच अगर कोई इमरजेंसी आ जाती है, तो लोगों को कर्जा लेना पड़ता है. यही वजह है कि आज आम इंसान के जीवन में कमाई कम और तनाव ज्यादा होने लगा है.
हाल ही में ईरेजोल्यूशन कंसल्टेंसी एक्सपर्ट पैनल के सर्वे में पाया गया कि हमारे समाज में 85% ऐसे लोग हैं, जो अपनी सैलरी का 40% हिस्सा ईएमआई भरने में अदा करते हैं. इसमें यह भी पाया गया कि जिन लोगों की तनख्वाह 35 हजार से 65 हजार तक है, ऐसे लोगों को ईएमआई का भुगतान करने के लिए हर महीने 28 से 30 हजार रुपए मासिक किस्त निकालनी पड़ती है. सोचिए जिनकी तनख्वाह 10 से 20 हजार के बीच होती है, उनके लिए महंगाई के इस दौर में घर चलाना कितना मुश्किल होता होगा और ज्यादातर मध्यम परिवार के लोग इसी कैटेगरी में आते हैं.
ब्रांड फोबिया और दिखावे ने गर्क की जिंदगी
देहरादून के रहने वाले त्रिलोक का कहना है कि आज पता नहीं लोगों को क्या ब्रांड फोबिया हो गया है. लोग कंफर्ट के बजाय दिखावे में जी रहे हैं और दूसरों को दिखाने के लिए ही अपनी कमाई का सारा पैसा खर्च कर देते हैं, फिर परेशान होते हैं. उन्होंने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा कि पहले समाज ऐसा नहीं होता था, जैसा आप देखने के लिए मिल रहा है. पहले ना नौकरी होती थी और ना ही बड़े बिजनेस होते थे.
पहले जॉइंट फैमिली में एक इंसान कमाता था और सबका पेट भर जाता था और लोग सुकून से रहते थे. लेकिन आज परिवार के सभी लोग काम करके भी सुकून की जिंदगी नहीं जी पाते हैं. अब अपना स्टेटस और दिखावे के चक्कर में लोग एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन गए हैं. पहले के वक्त में चीजों का अभाव था, लेकिन भावनाओं के होने से लोग खुशी- खुशी रहते थे. आज लोगों के पास सुविधाएं हैं, फिर भी लोग खुश नहीं हैं.
एक लोन चुकाने के लिए लेते हैं दूसरा लोन
देहरादून के रहने वाले परमजीत का कहना है, “जब ईएमआई नहीं होती थी, तब लोग अपनी चादर देखकर ही पैर फैलाते थे”. पहले समाज में बचत करने की प्रवृत्ति थी और कर्ज लेना एक सामाजिक शर्मिंदगी माना जाता था. लेकिन आज ‘अभी खरीदो, बाद में चुकाओ’ की मानसिकता ने वित्तीय अनुशासन को पूरी तरह खत्म कर दिया है और लोगों को कर्जदार बना दिया.
उन्होंने कहा कि स्टेटस सिंबल बनाने के चक्कर में लोग भविष्य की परेशानियों को खुद मोल लेते हैं. अगर बैंक आपको लोन दे रहा है, तो उसे वह कई गुना बढ़ाकर वापस लेता है. एक बार अगर ईएमआई शुरू हो जाती है, तो इसके बाद इंसान को इसे चुकाने के लिए दूसरा लोन लेने को मजबूर होना भी पड़ जाता है. डिजिटल लोन एप्स और आसान ऋण प्रक्रियाओं ने लोगों को उनकी हैसियत से ज्यादा खर्च करने के लिए उकसाया है.
राजपाल यादव को मदद मिली, हमारी मदद कौन करेगा?
उन्होंने कहा कि राजपाल यादव जैसे हाई-प्रोफाइल मामलों में तो उनकी मदद के लिए लोग आगे आए हैं, लेकिन एक आम आदमी के लिए यह स्थिति अक्सर मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और कभी-कभी आत्महत्या जैसे कदम को उठाने पर मजबूर करती है.
लोग मजबूरी में लेते हैं लोन
देहरादून की रहने वाली लाजवंती ने बताया कि वह सिंगल मदर हैं. कई साल पहले उनके पति का देहांत हो गया था, जिसके बाद दो बच्चों को पालने के लिए वह आंगनवाड़ी सहायिका के तौर पर काम कर रही हैं और उनकी तनख्वाह मात्र 5 हजार रुपए है. उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कोई चीज खरीदनी होगी, तो मासिक किस्त पर ही लेनी पड़ेगी. जैसे थोड़े टाइम पहले उन्होंने मोबाइल फोन लिया था.
उन्होंने कहा कि कई लोगों की मजबूरी होती है, ताकि वह धीरे-धीरे पैसा चुका सकें. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनकी तनख्वाह भी अच्छी होती है और वह एकदम सारा पैसा नहीं देना चाहते, धीरे-धीरे चुकाना चाहते हैं. इस तरह के कर्ज से बचना चाहिए. मजबूरी हो तभी लोन लेना चाहिए, क्योंकि यह धीरे-धीरे एक बड़ा अमाउंट बन जाती है, लोग कर्जदार बनते हैं और कई लोग आत्महत्या भी कर लेते हैं.
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