इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉट्स के इस दौर में दिल्ली, हरियाणा ही नहीं, बल्कि देहरादून के युवा अपनी जान जोखिम में डालकर खतरनाक स्टंट और वीडियो बना रहे हैं. कई सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर की जान भी चली गई है. रील्स और वीडियो के दौरान ही कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, इनमें महाराष्ट्र की आन्वी कामदार जैसी ट्रैवल ब्लॉगर का भी नाम शामिल है.
देहरादून के इस राइडर की भी मौत
वहीं देहरादून के फेमस अगस्त्य चौहान की मौत भी साल 2023 में तभी हुई, जब वह दिल्ली देहरादून हाइवे पर अपनी सुपरबाइक को 300 किमी प्रति घंटे की स्पीड से ला रहे थे. कंट्रोल खोने पर उनका एक्सीडेंट इतना भयंकर हुआ कि उनकी जान चली गई. इस तरह सोशल मीडिया पर रीलबाज लोगों की हरकतों के कई वीडियो भी वायरल होते हैं.
कई बार दून पुलिस संज्ञान भी लेती है. हाल ही में दिल्ली के द्वारिका में हुई कुछ दुर्घटनाओं ने इस बहस को दोबारा छेड़ दिया है कि क्या ‘लाइक्स’ और ‘शेयर’ का मीटर हमारी जिंदगी की कीमत से बड़ा हो गया है?
देहरादून की सड़कों और वादियों में ‘मौत का स्टंट’
देहरादून के राजपुर रोड, मसूरी हाईवे, थानो रोड और मालदेवता जैसे शांत इलाकों में अब सन्नाटे की जगह बुलेट के पटाखों और चीखते कैमरों ने ले ली है. प्राकृतिक सुंदरता और शांति के लिए मशहूर इन जगहों पर भी हुड़दंग मचाने वाले पहुंचकर यहां का सुकून भंग करते हैं. देहरादून निवासी राजीव मिश्रा का कहना है कि आज एक रात में स्टार बनने और फेम की चाहत में युवाओं को इतना अंधा बना दिया है कि उन्हें सुध-बुध नहीं रहती है, वह क्या कर रहे हैं?
कई युवा चलती बाइक पर स्टंट करना, ऊंची पहाड़ियों के किनारों पर खड़े होकर डांस करना या तेज रफ्तार ट्रैफिक के बीच रील बनाना अपनी शान समझने लगे हैं. उन्होंने कहा कि आजकल का युवा फिल्मी गानों पर खुद को ‘हीरो’ साबित करने के चक्कर में सुरक्षा नियमों को ताक पर रख देता है और खुद भी हादसे का शिकार हो जाता है और दूसरों को भी इसकी चपेट में ले लेता है.
पढ़ाई-लिखाई से दूर जा रहे बच्चे
उन्होंने कहा कि रील बनाने वाले लोग खतरनाक पहाड़, घाट और मंदिरों तक में रील्स बनाते हैं, जो नहीं होना चाहिए. देश की भावी पीढ़ी कहा जाने वाला युवा जिसमें 14 वर्ष से 28 वर्ष तक का वर्ग अब सोशल मीडिया का बीमार सा हो गया है. बच्चे सोचते हैं कि पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान नहीं देना है, बल्कि रील्स बनाकर फेमस होना है और पैसे कमाना है. लेकिन यह इतना आसान नहीं होता है. सोशल मीडिया आने के बाद बच्चे किताबों से दूर होते जा रहे हैं और मोरल वैल्यूज भी खोते जा रहे हैं.
संस्कारों की दुश्मन बनती जा रही है सोशल मीडिया
देहरादून निवासी रोशनी भट्ट का कहना है कि सोशल मीडिया गलत नहीं है, लेकिन उसका इस्तेमाल अगर गलत होता है, तो उसका रिजल्ट भी गलत ही आता है. आज बच्चे के हाथ में अभिभावक मोबाइल पकड़ा देते हैं और बच्चे रील्स देखते रहते हैं. लेकिन कई लोग इतना भद्दा कंटेंट डालते हैं, जिससे हमारे छोटे बच्चों पर भी असर पड़ता है.
मां-बाप को रखना चाहिए ध्यान
उन्होंने कहा कि जिस माध्यम के जरिए लोगों तक जानकारियां पहुंचानी चाहिए, उस पर अश्लीलता परोसी जाती है. दिल्ली में जिस तरह का हादसा हुआ है, ऐसा नहीं होना चाहिए. इसके लिए हर मां-बाप को चाहिए कि आपका बच्चा क्या कर रहा है? किसी की गलती से किसी की जान चले जाना बहुत दुखद है. अगर वह किसी सिंगल मदर का सिंगल चाइल्ड हो, तो ऐसी घटनाओं पर लगाम लगना चाहिए.
अविनाश चौहान का कहना है कि सोशल मीडिया पर रील्स से कई अच्छी चीजें भी सीखी जा सकती हैं. कंटेंट क्रिएटर को लाइक, शेयर की होड़ से हटकर इसका प्रभाव भी सोचना चाहिए. वीडियो बनाते हुए खतरनाक जगहों से दूर रहना चाहिए और दूसरों की जान का भी ख्याल रखना चाहिए.
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