तेजी से बढ़ रही है एलर्जी और सांस की बीमारियां
ईएनटी विशेषज्ञ बताते हैं कि आप अपने ‘एलर्जी ट्रिगर’ को पहचानें और उससे दूर रहे हैं. डॉ की माने तो बदलते मौसम में ठंड, ड्राईनेस और बढ़ते वायु प्रदूषण के खतरनाक मेल से एलर्जी और सांस संबंधी बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ गया है. उन्होंने बताया कि प्रदूषण के कारण सांस के माध्यम से जब सांस नली में जाते हैं, तो बैक्टीरियल/वायरल इंफेक्शन के साथ ही गले में दर्द, खराश, खांसी,जुकाम और गले का कैंसर तक हो सकता है. उनका कहना है कि कोल्ड वेदर, ड्राई एयर और प्रदूषण का स्तर जब एक साथ बढ़ता है, तो यह नाक, कान, गले और फेफड़ों के लिए गंभीर समस्या बन जाता है.
मौसम की दोहरी मार
प्रदूषण और सूखी ठंड का घातक मेल
डॉ बिष्ट के अनुसार, ‘कोल्ड वेदर’, ‘ड्राई एयर’ और बढ़ते प्रदूषण का स्तर एक साथ मिलकर शरीर के श्वसन तंत्र पर सीधा हमला कर रहे हैं. बारिश न होने की वजह से हवा में मौजूद धूल के कण और प्रदूषक तत्व जमीन पर नहीं बैठ पा रहे हैं, जिससे वातावरण में एक जहरीली चादर सी बन गई है.
ओपीडी में ENT मरीजों की बढ़ी संख्या
देहरादून के प्रमुख अस्पतालों के ईएनटी विशेषज्ञों ने बताया कि वर्तमान में उनके पास आने वाले मरीजों में गले में दर्द, खराश, लगातार खांसी, जुकाम और एलर्जी की शिकायतें सबसे ज्यादा हैं. इस स्थिति में प्रदूषित कणों के सांस नली में जाने से बैक्टीरियल और वायरल इंफेक्शन का खतरा होता है. वहीं लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से गले के कैंसर जैसी घातक बीमारियों की आशंका बनी रहती है.
‘एलर्जी ट्रिगर’ की पहचानना और इनसे बचाव
डॉ बिष्ट ने बताया कि शुष्क हवा के चलते नाक और गले की झिल्ली का सूखना, जिससे इंफेक्शन आसानी से शरीर में प्रवेश कर जाता है. “बदलते मौसम में ठंड, ड्राईनेस और बढ़ते वायु प्रदूषण का यह मेल नाक, कान, गले और फेफड़ों के लिए बेहद खतरनाक है. लोगों को अपने ‘एलर्जी ट्रिगर’ को पहचानना चाहिए और उससे बचाव के उपाय करने चाहिए.
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