गया के मधुमक्खी पालक चितरंजन कुमार इटालियन प्रजाति की मधुमक्खियों का पालन करते हैं. करीब 20 साल पहले उन्होंने पांच बॉक्स से शुरुआत की थी. उन्होंने रांची से प्रशिक्षण लेकर और पंजाब से मधुमक्खियां खरीदकर काम शुरू किया था. शुरुआती कठिनाइयों के बाद आज उनके पास 500 से अधिक बॉक्स हैं. वे सालाना लगभग 20 टन शहद उत्पादन कर 8 से 9 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रहे हैं.
20 साल में चितरंजन गया ही नहीं बल्कि बिहार के एक जाने-माने मधुमक्खी पालक बन गए. आज उनके पास 500 से अधिक मधुमक्खी बॉक्स है और सालाना शहद का उत्पादन 20 टन तक है. स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद मधुमक्खी पालन सीखा. दो साल तक दूसरे मधुमक्खी पालक के यहां महीने पर काम करते रहे. फिर नौकरी छोड़ खुद से मधुमक्खी पालन करने का निर्णय लिया और आज सालाना 8 से 9 लाख रुपये कमा रहे हैं.
लोगों को दे रहे रोजगार
चितरंजन कहते हैं कि साल भर शहद का काम चलता रहता है. सरसो के बाद सहजन, करंज के फूलों से हमारी टीम शहद निकालती है. मधुमक्खी पालन में काफी मेहनत होती है और मधुमक्खियों की देखरेख के लिए उन्होंने 12 लोगों को रोजगार भी दे रखा है. जब जिले में फूलों की कमी हो जाती है तो मधुमक्खी बॉक्स को लेकर माइग्रेशन करते हैं और मध्य प्रदेश और झारखंड चले जाते हैं. गर्मी और बरसात के दिनों में फूलों की ज्यादा दिक्कत होती है. ऐसे में मधुमक्खियों को जीवित रखने के लिए चीनी घोलकर खिलाया जाता है.
मधुमक्खी पालकों को मिले सब्सिडी
हालांकि, इन्होंने बताया कि मधुमक्खी पालन के व्यवसाय में पिछले कुछ वर्षों से कई तरह के समस्याएं सामने आने लगी हैं. सबसे बड़ी समस्या बिहार में बाजार का है. बाजार नहीं रहने के कारण बड़े व्यवसायी कम रेट पर शहद खरीदकर ले जाते हैं. आज थोक भाव ₹80 किलो भी खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है. इन्होंने सरकार से मांग की है कि मधुमक्खी पालकों को सरकार सहयोग करें और जिस तरह धान पर सब्सिडी दी जाती है उसी तरह शहद उत्पादन पर मधुमक्खी पालकों को सब्सिडी दी जाना चाहिए.
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