अंकुरण के 22 दिनों में सबसे ज्यादा खतरा
डॉ. विनोद निर्मलकर के अनुसार, बुवाई के 22 दिन के भीतर जब किसान पहली बार सिंचाई करते हैं, उसी समय बीमारियों का प्रकोप सबसे अधिक होता है. पौधे जब छोटे होते हैं, तब जमीन और पौधे के जुड़ने वाले हिस्से यानी कॉलर रीजन में संक्रमण शुरू हो जाता है.
कॉलर रॉट: पौधे जड़ से गलकर हो जाते हैं खत्म
इस अवस्था में कॉलर रीजन से सड़न शुरू होती है, जहां जमीन और तना आपस में जुड़े होते हैं. संक्रमित हिस्से में सफेद रूई या फूल जैसा फफूंद दिखाई देता है. धीरे-धीरे पूरा पौधा सूखकर नष्ट हो जाता है. नमी और सिंचाई मिलने पर यह बीमारी तेजी से फैलती है, जिससे खेत में बड़े पैमाने पर पौधे खत्म हो सकते हैं.
ड्राई रूट रॉट: जड़ें काली होकर टूटने लगती हैं
दूसरी प्रमुख बीमारी ड्राई रूट रॉट है, जो पौधे की बढ़वार अवस्था में दिखाई देती है. इसमें पौधा ऊपर से नीचे की ओर सूखने लगता है. जब पौधे को उखाड़कर देखा जाता है तो जड़ें काली पड़ चुकी होती हैं और हल्के से छूने पर आसानी से टूट जाती हैं.
उगटा रोग (चना विल्ट): फूल अवस्था में गंभीर समस्या
तीसरी गंभीर बीमारी उगटा रोग या चने का विल्ट है, जो फूल आने की अवस्था में दिखाई देती है. इस बीमारी में पूरा पौधा अचानक मुरझा जाता है. यह भी भूमि जनित रोग है और एक बार फैलने पर तेजी से पूरे खेत को प्रभावित कर सकता है.
भूमि और बीज उपचार से ही संभव है बचाव
डॉ. निर्मलकर बताते हैं कि ये तीनों बीमारियां भूमि से फैलती हैं, इसलिए सबसे पहले मिट्टी का उपचार जरूरी है. इसके बाद बुवाई से पहले बीज उपचार करना बेहद प्रभावी उपाय है.
बीज उपचार का सही तरीका
1 किलो बीज में 10 ग्राम राइजोबियम मिलाएं. बीज को मिलाकर 15-20 मिनट तक छोड़ दें, ताकि बीज पर अच्छा आवरण बन जाए. इसके बाद ट्राइकोडर्मा (हाइजेनेम प्रजाति) का बीज के ऊपर छिड़काव कर अच्छी तरह उपचारित करें. बीज सूखने के बाद ही बुवाई करें.
समय रहते उपाय अपनाकर बचाएं फसल
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान समय पर भूमि और बीज उपचार कर लें, तो चना की फसल में होने वाली इन घातक बीमारियों से काफी हद तक बचाव संभव है और उत्पादन में भी बढ़ोतरी की जा सकती है.
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