हिसार। दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए पशुपालक उन्नत नस्ल की भैंसें पाल रहे हैं लेकिन अधिक दूध देने वाली भैंसों में थनैला या मास्टिटिस बीमारी तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार 20 लीटर से अधिक दूध देने वाली भैंसें इस बीमारी की अधिक शिकार हो रही हैं। इसका प्रमुख कारण दूध निकालने में देरी, थनों में दूध का रह जाना और इससे विषाणु का बढ़ना है।
केंद्रीय भैंस अनुसंधान संस्थान के पीआरओ डॉ. राजेश कुमार के अनुसार, गोबर-मूत्र से भरे कीचड़, थनों की सफाई में लापरवाही और थन में चोट भी थनैला का कारण बन सकते हैं। थनैला एक संक्रामक बीमारी है जो सीधे भैंस के थनों को प्रभावित करती है। इससे न सिर्फ दूध की मात्रा घटती है बल्कि गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। कई मामलों में दूध में थक्के, पानीपन या खून के अंश तक देखे जा रहे हैं।
भैंसों के दूध की नियमित टेस्टिंग के माध्यम से शुरुआती स्तर पर संक्रमण की पहचान की जा रही है। पशुपालक थनों की सफाई पर विशेष ध्यान दें और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करें।
दूध में थक्के, गाढ़ापन या रंग बदलना थनैला का संकेत
डॉ. राजेश कुमार ने बताया कि थनैला जांच का सबसे आसान तरीका कैलिफोर्निया मास्टिटिस टेस्ट (सीएमटी) है, जिसे घर पर मात्र 50 पैसे में किया जा सकता है। इसमें चार खानों वाले पैडल में प्रत्येक थन का दूध अलग-अलग निकाला जाता है और सीएमटी रीजेंट मिलाकर धीरे-धीरे घुमाया जाता है। यदि दूध में थक्के, गाढ़ापन या रंग बदलता है, तो यह थनैला का संकेत है। यह जांच हर 15 दिन में करना चाहिए ताकि भैंस समय रहते सुरक्षित रहें।
ये हैं बीमारी के लक्षण
-थन में सूजन
– दूध का रंग बदलना
– दूध में थक्के या खून आना
– दूध उत्पादन में भारी गिरावट
– थन का सख्त हो जाना
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.