Bikaner Lathmaar Holi 2026 : बीकानेर में होली पर हर्ष और व्यास जाति के लोग डोलची से पानी मारकर अनोखा खेल खेलते हैं, जो आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रतीक है और वर्षों पुरानी परंपरा को जीवित रखता है. यहां हर्ष और व्यास जाति के लोग एक खास तरह से होली खेलते हैं. चमड़े से बनी डोलची में पानी भरकर एक दूसरे की पीठ पर वार किया जाता है. बड़े
होली के रंगों का मनोविज्ञान
यहां हर्ष और व्यास जाति के लोग एक खास तरह से होली खेलते हैं. चमड़े से बनी डोलची में पानी भरकर एक दूसरे की पीठ पर वार किया जाता है. बड़े-बड़े बर्तनों में पानी भरा जाता है और फिर हजारों लोग इस खेल में शामिल होकर डोलची से एक दूसरे की पीठ पर पानी मारते हैं. यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि एक तरह का सामूहिक उत्सव बन जाता है.
पानी का वार, बढ़ता जोश
इस खेल में खास बात यह है कि डोलची से पीठ पर पानी जितनी जोर से लगता है, उतनी ही तेज आवाज आती है. और यही आवाज खेल का जोश बढ़ा देती है. जैसे-जैसे आवाज तेज होती जाती है, वैसे-वैसे माहौल में उत्साह भी बढ़ता जाता है. लोग इसे किसी प्रतिस्पर्धा की तरह नहीं बल्कि उत्सव की तरह खेलते हैं. इसमें कोई हार-जीत नहीं होती, बल्कि सभी मिलकर इस परंपरा को निभाते हैं.
विवाद से शुरू हुई परंपरा
बताया जाता है कि पुराने समय में हर्ष और व्यास जाति के लोगों के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया था. उस विवाद को खत्म करने के लिए इस पानी के खेल की शुरुआत की गई. तभी से यह परंपरा चलती आ रही है. अब यह खेल सिर्फ एक रस्म नहीं रहा, बल्कि आपसी प्रेम और सौहार्द का प्रतीक बन चुका है.
इस तरीके से दी जाती है सौहार्द का संदेश
बीकानेर में आज भी यह खेल लोगों को जोड़ने का काम करता है. होली के मौके पर इसे खेलकर लोग यह संदेश देते हैं कि पुराने मतभेद भुलाकर साथ चलना ही सबसे बड़ा त्योहार है. सालों से चली आ रही यह परंपरा आज भी लोगों को एक साथ लाती है और यही इसकी सबसे बड़ी खूबसूरती है.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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