डॉ. मोहन भागवत 2 और 3 जनवरी को मध्यभारत प्रांत के भोपाल विभाग केंद्र पर दो दिवसीय प्रवास पर हैं. इसी क्रम में उन्होंने युवा संवाद कार्यक्रम को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि भारत से दुनिया को एक नए रास्ते की उम्मीद है. लेकिन इसके लिए भारत को पहले स्वयं को सशक्त बनाना होगा. उन्होंने स्पष्ट किया कि यह शक्ति केवल हथियारों या अर्थव्यवस्था से नहीं आती, बल्कि समाज की संगठित क्षमता से बनती है.
शक्ति के बिना सत्य प्रभावी नहीं होता
संघ प्रमुख ने कहा कि दुनिया में व्यवहार का नियम स्पष्ट है. शक्ति के बिना सत्य प्रभावी नहीं हो पाता. उन्होंने कहा कि जब तक समाज संगठित और सक्षम नहीं होगा, तब तक उसकी बात को वैश्विक मंच पर गंभीरता से नहीं लिया जाएगा. भागवत ने कहा कि भारत को ऐसा राष्ट्र बनना होगा, जो अपनी बात मजबूती से रख सके. इसके लिए युवाओं की भूमिका सबसे अहम है.
विकास भारतीय स्वभाव के अनुरूप होना चाहिए
डॉ. भागवत ने विकास की दिशा पर भी स्पष्ट टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि जो विकास हमारी प्रकृति, भाषा और संस्कृति के विरुद्ध होगा, वह देश को आगे नहीं बढ़ाएगा. उन्होंने कहा कि ऐसा विकास समाज को मजबूत करने के बजाय उसे कमजोर करेगा. उन्होंने नकल आधारित विकास मॉडल पर सवाल उठाए और कहा कि भारत को अपने स्वभाव और परंपराओं के अनुरूप आगे बढ़ना होगा.
युवाओं को सर्वांगीण रूप से सक्षम बनना होगा
युवा संवाद में भागवत ने कहा कि भारत को सशक्त बनाने के लिए युवाओं को शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक रूप से मजबूत होना होगा. उन्होंने कहा कि अभी यह सामर्थ्य अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंची है. उन्होंने माना कि देश में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन उसे संगठित दिशा देने की जरूरत है. संघ इसी उद्देश्य से कार्य कर रहा है.
समाज की भूमिका सबसे अहम
संघ प्रमुख ने कहा कि देश को बड़ा बनाने का श्रेय किसी एक संगठन, पार्टी या सरकार को नहीं दिया जा सकता. उन्होंने कहा कि नेता, नीतियां, नारे, पार्टी और सरकार सभी सहायक होते हैं. असली ताकत समाज के पास होनी चाहिए. समाज में देशभक्ति, अनुशासन और जिम्मेदारी जैसे गुण व्यवहार में आएंगे, तभी राष्ट्र मजबूत बनेगा.
संघ किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं
डॉ. भागवत ने संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों को लेकर फैली धारणाओं पर भी टिप्पणी की. उन्होंने कहा कि भाजपा, विहिप या अन्य संगठनों को देखकर संघ को नहीं समझा जा सकता. संघ का कार्य स्वयंसेवक तैयार करना है. उन्हें विचार, संस्कार और लक्ष्य देना है. इसके बाद वे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में स्वतंत्र रूप से काम करते हैं. संघ किसी का रिमोट कंट्रोल नहीं है.
भाषा और सांस्कृतिक चेतना पर जोर
भागवत ने भाषा विवाद पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि जिस राज्य में रहते हैं, वहां की भाषा आनी चाहिए. उन्होंने कहा कि तीन भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है. एक राज्य की भाषा, एक देश की भाषा और एक दुनिया की भाषा. उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति की पहचान होती है.
संघ के संघर्षों का किया उल्लेख
संघ प्रमुख ने कहा कि संघ के खिलाफ लंबे समय तक दुष्प्रचार हुआ. स्वयंसेवकों पर हमले हुए. प्रतिबंध भी लगाए गए. इसके बावजूद संघ का कार्य रुका नहीं. उन्होंने कहा कि संघ कभी चंदा नहीं मांगता. संगठन स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा से चलता है. आज संघ के पास करीब 60 लाख स्वयंसेवक हैं.
शताब्दी वर्ष में विस्तार की योजना
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ के शताब्दी वर्ष में समाज को संगठित करने का कार्य और तेज किया जाएगा. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि भारत के बाहर रहने वाले उन लोगों को भी संगठित करने पर विचार होगा, जो ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा रहे हैं. उन्होंने कहा कि इसके लिए मानसिक तैयारी अभी से जरूरी है. कार्यक्रम में मौजूद युवाओं से संघ प्रमुख ने आह्वान किया कि वे समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझें. उन्होंने कहा कि जब समाज संगठित होता है, तभी राष्ट्र मजबूत बनता है.
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