Success Story : भीलवाड़ा के छोटे से गांव की मंजू सुथार ने पुराने और नए कपड़ों से पोटलियां बनाकर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है. उनकी बनाई पोटलियों की डिमांड अब पूरे राजस्थान में बढ़ रही है और कई महिलाएं भी इस काम से जुड़कर रोजगार पा रही हैं. खेती से शुरू हुई उनकी यह यात्रा अब सफल बिजनेस में बदल चुकी है. मंजू साबित करती हैं कि सही दिशा मिले तो गांव की प्रतिभा भी बड़ी पहचान बना सकती है.
मंजू सुथार पहले अपने परिवार के साथ खेती का काम करती थीं. उनके गांव के पास स्थित बांदड़ा बालाजी मंदिर में वे पर्स और छोटी पोटलियां बनाकर देती थीं क्योंकि श्रद्धालु वहां पोटली में लक्ष्मी का प्रतीक रखकर भगवान को अर्पित करते हैं. इसी दौरान उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न इसे एक व्यापार के रूप में शुरू किया जाए. फिर उन्होंने घर पर ही पोटली बैग बनाना शुरू किया. शुरुआत में वे पुराने और नए कपड़ों का उपयोग कर 15 से 20 पोटलियां बनाती थीं और उन्हें बेच देती थीं. बाद में राजविका के माध्यम से उन्हें इस काम को आगे बढ़ाने की जानकारी और दिशा मिली. लोन लेकर उन्होंने अपने काम का विस्तार किया और पुराने तथा नए वेलवेट कपड़े से आकर्षक पोटलियां और बैग तैयार करना शुरू किया. आज उनकी लागत निकलने के साथ अच्छा मुनाफा भी हो रहा है और लोग उनकी बनाई पोटलियों को काफी पसंद कर रहे हैं.
पोटलियों के बढ़ते व्यापार ने बदली जिंदगी
मंजू की पोटलियां आज पूजा-पाठ, शादी-विवाह और गिफ्ट पैकिंग में खूब पसंद की जा रही हैं. उनकी मेहनत और गुणवत्ता के कारण इनकी डिमांड लगातार बढ़ रही है. उन्होंने बताया कि पहले जहां वे सीमित मात्रा में पोटलियां बनाती थीं, अब मांग बढ़ने के साथ-साथ उनका व्यापार भी तेजी से आगे बढ़ रहा है. साथ ही गांव की कई अन्य महिलाओं को भी उन्होंने अपने काम से जोड़ा है जिससे वे आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं. मंजू कहती हैं कि महिलाओं में हुनर की कमी नहीं है, बस उन्हें सही दिशा और प्रोत्साहन की जरूरत होती है.
गांव की महिलाओं के लिए बनी प्रेरणा
मंजू सुथार कहती हैं कि चाहे कोई गांव में रहता हो या शहर में, पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़, अगर उसके हाथों में हुनर है तो वह घर बैठे भी अपना काम शुरू कर सकता है. उन्होंने खुद एक छोटे से काम से शुरुआत की और आज उनका बिजनेस अच्छी तरह आगे बढ़ रहा है. मंजू अब अलग-अलग शहरों में जाकर भी बिक्री बढ़ाने की योजना बना रही हैं ताकि उनका काम और आगे बढ़ सके. उनकी यह यात्रा दिखाती है कि आत्मनिर्भरता की राह घर के छोटे से काम से भी शुरू हो सकती है और धीरे-धीरे सपने बड़े बनते जाते हैं.
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नाम है आनंद पाण्डेय. सिद्धार्थनगर की मिट्टी में पले-बढ़े. पढ़ाई-लिखाई की नींव जवाहर नवोदय विद्यालय में रखी, फिर लखनऊ में आकर हिंदी और पॉलीटिकल साइंस में ग्रेजुएशन किया. लेकिन ज्ञान की भूख यहीं शांत नहीं हुई. कल…और पढ़ें
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