राजस्थान की माटी का कण-कण शौर्य और गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है, लेकिन बानसूर विधानसभा क्षेत्र में यह गौरव आज अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है। ग्राम हाजीपुर और बानसूर मुख्य कस्बे की पहाड़ियों पर स्थित ऐतिहासिक किले प्रशासनिक उपेक्षा और पुरातत्व विभाग की उदासीनता के चलते खंडहर में तब्दील हो रहे हैं। जो किले कभी सुरक्षा के अभेद्य कवच और राजपूताना आन-बान-शान के प्रतीक थे, वे आज सरकारी फाइलों में गुम होकर अपना अस्तित्व खो रहे हैं।
बानसूर किले का स्वर्णिम इतिहास
बानसूर का यह विशाल किला लगभग 400 साल पुराना है। 16वीं शताब्दी में उदयपाल सिंह बानसूर ने इसका निर्माण करवाया था, जिनके नाम पर ही इस शहर का नाम ‘बानसूर’ पड़ा। रियासती काल में यह जयपुर और भरतपुर रियासतों की सीमाओं पर एक महत्वपूर्ण सामरिक चौकी के रूप में कार्य करता था। जनश्रुतियों के अनुसार, यहां पूर्व में कैदियों को रखा जाता था। महाराजा सूरजमल जाट ने यहां एक गुप्त सुरंग का निर्माण करवाया था, जो सीधे अलवर और भरतपुर तक जाती थी। इतना ही नहीं, अलवर जिले की सबसे गहरी बावड़ी भी इसी किले के भीतर स्थित है, जो प्राचीन जल प्रबंधन का अद्भुत नमूना है।
बदहाली: दरकती दीवारें और दुर्गम राह
आज संरक्षण के अभाव में इन किलों की स्थिति अत्यंत भयावह है। हाजीपुर किले के मुख्य बुर्ज और परकोटे की दीवारें जगह-जगह से ढह चुकी हैं। पूरे प्रांगण में कंटीली झाड़ियों का साम्राज्य है। बारिश के दिनों में कमजोर नींव के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर कभी भी जमींदोज हो सकती है। यही हाल बानसूर सिटी स्थित मुख्य किले का भी है, जहां उचित देखरेख न होने से वह मलबे के ढेर में बदलता जा रहा है।
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पुरातत्व विभाग और प्रशासन की चुप्पी
स्थानीय ग्रामीणों में इस अनदेखी को लेकर भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को बार-बार अवगत कराने के बावजूद केवल खोखले आश्वासन ही मिले हैं। पुरातत्व विभाग ने आज तक इन किलों के जीर्णोद्धार या सर्वेक्षण के लिए कोई रुचि नहीं दिखाई है। इसके अलावा, अरावली की इन पहाड़ियों पर मंडराता अवैध खनन और अतिक्रमण का खतरा इन किलों के वजूद को और भी संकट में डाल रहा है।
पर्यटन की संभावनाएं और मांग
यदि प्रशासन इन किलों को ‘संरक्षित स्मारक’ घोषित कर इनका कायाकल्प करे, तो यह क्षेत्र पर्यटन के मानचित्र पर उभर सकता है। इससे न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर बचेगी, बल्कि स्थानीय युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे। ग्रामीणों की सरकार से पुरजोर मांग है कि ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए तुरंत बजट जारी किया जाए, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास को किताबों के बाहर भी देख सके।
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