कुंजू सुपर एक्सल दोपहिया वाहन पर अपना ठेला लगाकर पानीपूरी और भेलपूरी बेचते हैं. वह लोकल 18 को बताते हैं कि उनके यहां सबसे ज्यादा मांग पानीपूरी की रहती है, जिसे स्थानीय भाषा में गुपचुप कहा जाता है. वह 10 रुपये में 6 गुपचुप देते हैं, जो आकार में सामान्य से बड़े होते हैं. ग्राहक की मांग के अनुसार वह तुरंत गुपचुप तैयार करते हैं और ताजा और स्वादिष्ट तरीके से उन्हें परोसते हैं. उनके ठेले पर केवल भेलपूरी और खट्टा-मीठा गुपचुप ही मिलता है, जिससे उनकी अलग पहचान बन गई है और लोग दूर से ही उन्हें पहचान लेते हैं.
करीब 25 से 30 वर्षों से कुंजू इसी काम से अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं. रोजाना दोपहर लगभग डेढ़ बजे वह घर से निकलते हैं और बालोद शहर के आसपास के बड़े गांवों जैसे- देवारभांट, पाकुरभांट, सिवनी, पारागांव, चरोटा और झलमला में घूम-घूमकर बिक्री करते हैं. वह स्कूलों के सामने, गलियों और चौक-चौराहों पर जाकर घंटी बजाते हैं या आवाज लगाकर लोगों को आकर्षित करते हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक उनके गुपचुप के स्वाद के दीवाने हैं.
दिनभर की आय लगभग 300 रुपये
कुंजू आगे बताते हैं कि पेट्रोल और सामग्री का खर्च निकालने के बाद उन्हें प्रतिदिन लगभग 300 रुपये की शुद्ध आय हो जाती है. वह इस कमाई से संतुष्ट हैं और आत्मसम्मान के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं. उनका कहना है कि मेहनत से कमाया गया पैसा ही असली खुशी देता है और इसी से इंसान को सच्चा सुकून मिलता है.
युवाओं के लिए प्रेरणा
आज के समय में जब कई युवा मेहनत से बचने और नशे की ओर बढ़ते जा रहे हैं, ऐसे दौर में कुंजू का संघर्षपूर्ण और ईमानदार जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है. उनका चलता-फिरता ठेला केवल गुपचुप बेचने का साधन नहीं बल्कि मेहनत, आत्मनिर्भरता और ईमानदारी की एक जीवंत कहानी भी है. कुंजू यह साबित करते हैं कि उम्र चाहे जो भी हो, अगर हौसला मजबूत हो, तो इंसान अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है और दूसरों के लिए मिसाल बन सकता है.
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