बागेश्वर के साहित्यकार गोपाल बोरा ने लोकल 18 को बताया कि बिलौनासेरा गांव में एक सास और उसकी बहू रहती थीं, जो खेती-बाड़ी में अपनी असाधारण मेहनत के लिए पूरे इलाके में प्रसिद्ध थीं. दोनों का अधिकांश समय खेतों में बीतता था. उस दौर में पहाड़ की महिलाएं घर-परिवार, पशुपालन और खेती तीनों जिम्मेदारियां एक साथ निभाती थीं. इसी कठिन जीवन के बीच सास और बहू के बीच एक अनोखी शर्त लग गई. शर्त यह थी कि वे अश्विन के महीने में बिना रुके धान के खेत में गुड़ाई और निराई का काम पूरा करेंगी और काम खत्म होने से पहले विश्राम नहीं करेंगी, क्योंकि गांव में सभी ने अपने खेतों की निराई-गुड़ाई कर दी है और अब केवल उनका ही खेत बचा है.
लोककथा में त्याग, तपस्या और श्रम का प्रतीक
कहा जाता है कि यह शर्त केवल प्रतिस्पर्धा नहीं थी, बल्कि मेहनत और सहन शक्ति को साबित करने की एक चुनौती बन गई. दोनों सुबह से रात तक खेत में जुटी रहीं. खेत करीबन 14 नाली का था, खेत के बीचोंबीच “रोटी की छपरी”(नाश्ता) रखी. जहां खाने के लिए रोटियां और पानी रखा था, ताकि काम के दौरान भूख लगने पर इसे खाया जा सके, लेकिन सास-बहू की जिद इतनी प्रबल थी कि वे रोटी की छपरी तक भी नहीं गईं. यही रोटी की छपरी इस लोककथा में त्याग, तपस्या और श्रम का प्रतीक बन गई.
सास-बहू ने खेत में ही तोड़ दिया दम
अब दोनों सुबह से रात तक निराई-गुड़ाई में जुटी रहीं. एक तरफ से सास और दूसरी तरफ से बहू गुड़ाई कर रही थी. दिनभर की भूख-प्यास और लगातार मेहनत की वजह से उनका शरीर थकान से टूट गया और जान हलक तक आ गई. जैसे ही सास ने पानी के डिब्बे और बहू ने रोटी की छपरी में हाथ लगाया, दोनों ने एक साथ वहीं दम तोड़ दिया. घटना की सूचना मिलते ही गांव के लोग गहरे दुखी और आश्चर्यचकित हुए. बाद में जिस विशाल खेत में यह घटना हुई, वही “सास-बहू का खेत” कहलाने लगा. आज भी स्थानीय लोग इस खेत को सम्मान और भावुकता के साथ देखते हैं.
पहाड़ की महिलाओं के संघर्ष का आईना
यह कथा केवल दुखांत कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ की महिलाओं के संघर्ष का आईना भी है. यह बताती है कि कैसे मेहनत, जिद और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन न बनने पर जीवन कितना कठोर हो सकता है. लोककथा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती है कि मेहनत जरूरी है, लेकिन स्वास्थ्य और भोजन की अनदेखी नहीं करनी चाहिए.
आज भी बिलौनासेरा गांव में जब बुजुर्ग यह कथा सुनाते हैं, तो सास-बहू खेत और रोटी की छपरी केवल स्थान नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज की चेतावनी और प्रेरणा बनकर सामने आती है, जहां श्रम का सम्मान है, लेकिन जीवन से बड़ा कुछ नहीं है. हालांकि आधुनिकता के इस दौरान में इस स्थान पर दर्जनों घर बन चुके हैं, लेकिन पौराणिक कथा आज भी जीवित है.
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