लंबी उम्र का सीक्रेट
बागेश्वर आए व्यापारी राजेश कुमार लोकल 18 से बताते हैं कि लोहाघाट के बर्तन 100 प्रतिशत शुद्ध और उच्च श्रेणी के लोहे से बनाए जाते हैं. कारीगर पुराने रेलवे ग्रेड या उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे लोहे को पिघलाकर इनका निर्माण करते हैं, जिससे ये बर्तन अत्यधिक मजबूत और वर्षों तक चलने वाले होते हैं. सही देखभाल के साथ ये पीढ़ियों तक इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जो इन्हें टिकाऊ जीवनशैली का प्रतीक बनाता है. इन बर्तनों की सबसे बड़ी खासियत इनका पूरी तरह हस्तनिर्मित होना है. मशीनों की बजाय अनुभवी कारीगर हथौड़ों से पीट-पीटकर तवा, कढ़ाई, पतीला और हांडी को आकार देते हैं. बर्तन पर दिखने वाले हथौड़े के हल्के निशान इसकी असल पहचान माने जाते हैं, जो बताते हैं कि यह असली लोहाघाट कारीगरी है.
सेहत के लिए कैसे फायदेमंद
लोहे के बर्तनों में पकाया गया भोजन शरीर को स्वाभाविक रूप से आयरन प्रदान करता है. खासतौर पर एनीमिया की समस्या से जूझ रहे लोगों के लिए यह बेहद लाभकारी माना जाता है. नियमित रूप से लोहे के बर्तन में खाना पकाने से शरीर में आयरन का स्तर संतुलित रहता है, जबकि नॉन-स्टिक बर्तनों में मौजूद कोटिंग से होने वाले संभावित नुकसान से भी बचाव होता है. सही तरीके से सीजनिंग (तेल लगाकर गर्म करना) करने पर ये बर्तन समय के साथ प्राकृतिक रूप से नॉन-स्टिक बन जाते हैं. इनका भारी बेस गर्मी को समान रूप से फैलाता है, जिससे खाना जलता नहीं और धीमी आंच पर पकने वाले पारंपरिक पहाड़ी व्यंजन—जैसे भट्ट के डुबके, मडुए की रोटी या झोल—बेहतर स्वाद के साथ तैयार होते हैं.
बागेश्वर में कहां मिलेंगे असली
बागेश्वर में लोहाघाट के असली लोहे के बर्तन मुख्य रूप से उत्तरायणी मेले में बिकने के लिए आते हैं. जहां ग्राहक गुणवत्ता की जांच आसानी से कर सकते हैं. लोहाघाट में पारंपरिक रूप से हाथों से बने कई तरह के लोहे के बर्तन बनते हैं, जिनमें बड़ी-छोटी कढ़ाई, तवा, परात, फ्राई पैन, करछी, चिमटे, इमामदस्ता, टिक्ची, चाकू, बसूला और छलनी जैसे बर्तन शामिल हैं. इनकी कीमत 250-300 रुपये से शुरू होकर 30 से 40 हजार तक जाती है. जो अपने स्वास्थ्य लाभों और टिकाऊपन के लिए प्रसिद्ध हैं, और आधुनिक इंडक्शन पर भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. लोहे के साथ व्यापारी तांबा और पीतल के बर्तन भी लेकर आते हैं.
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