शिव-पार्वती की कथाओं से जुड़ा झोड़ा
झोड़ा गीतों में कई रचनाएं शिव-पार्वती, जिन्हें स्थानीय भाषा में गौरा-महेश कहा जाता है, की लीलाओं पर आधारित होती हैं. यही कारण है कि झोड़ा केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें आध्यात्मिक रंग भी साफ नजर आता है. लोकभाषा में गाए जाने वाले ये गीत लोगों की आस्था और परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं.
धार्मिक आस्था से भी जुड़ा है झोड़ा
धार्मिक दृष्टि से झोड़ा का बागेश्वर से गहरा संबंध है. बागनाथ मंदिर और शिव उपासना की परंपरा इस क्षेत्र की पहचान रही है. झोड़ा-चांचरी में गाए जाने वाले शिव-पार्वती से जुड़े गीत स्थानीय आस्था और धार्मिक कथाओं को सरल लोकभाषा में जीवित रखते हैं. यह परंपरा बिना किसी लिखित दस्तावेज के पीढ़ियों से आगे बढ़ती आ रही है.
सामाजिक स्तर पर झोड़ा गांवों को जोड़ने का काम करता है. बागेश्वर के कांडा, कपकोट, गरुड़ और आसपास के क्षेत्रों में त्योहारों के अवसर पर सामूहिक झोड़ा किया जाता है. इस दौरान जाति, वर्ग और उम्र के सभी भेद अपने आप खत्म हो जाते हैं. झोड़ा सामाजिक समरसता, भाईचारे और सहभागिता का मजबूत माध्यम बनता है.
आधुनिक दौर में भी जीवित परंपरा
आज के आधुनिक और शहरीकरण के दौर में भी झोड़ा बागेश्वर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से थामे हुए है. लोक कलाकार, सांस्कृतिक संस्थाएं और मेलों के आयोजन इस परंपरा को जीवित रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. कुल मिलाकर कहा जाए तो झोड़ा केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि बागेश्वर के लोकजीवन, इतिहास और आस्था का संगम है, जो कुमाऊं की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है.
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