हुड़का पहाड़ का पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसकी आवाज पूरे माहौल को उत्साह से भर देती थी. तबले और हारमोनियम के साथ जब बैठकी होली शुरू होती, तो लोग घंटों तक राग-रागिनियों में डूबे रहते. पुरुष और महिलाएं अलग-अलग समूह में होली गाते थे, जबकि खड़ी होली में लोग गोल घेरा बनाकर नाचते थे. गीतों में भगवान, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक जीवन की झलक मिलती थी. पुराने समय की होली में खानपान भी आज से काफी अलग था.
पारंपरिक वाद्य यंत्र से मनती थी होली
हुड़का पहाड़ का पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसकी आवाज पूरे माहौल को उत्साह से भर देती थी. तबले और हारमोनियम के साथ जब बैठकी होली शुरू होती, तो लोग घंटों तक राग-रागिनियों में डूबे रहते. पुरुष और महिलाएं अलग-अलग समूह में होली गाते थे, जबकि खड़ी होली में लोग गोल घेरा बनाकर नाचते थे. गीतों में भगवान, ऋतु परिवर्तन और सामाजिक जीवन की झलक मिलती थी. पुराने समय की होली में खानपान भी आज से काफी अलग था. आज जहां बाजारों में गुजिया और तरह-तरह की मिठाइयां मिलती हैं, वहीं पहले गांवों में गुजिया नहीं बनती थी. उसकी जगह घरों में गुड़, सूजी या आटे का हलवा और मसालेदार आलू बनाया जाता था. यही प्रसाद के रूप में बांटा जाता था. कई जगह भांग की चटनी और मंडुवे की रोटी भी परोसी जाती थी.
अलाव के चारो ओर बैठकर गाते थे गीत
सबसे खास बात यह थी कि होली के मौके पर शहरों में काम करने वाले प्रवासी लोग भी अपने गांव लौट आते थे. पूरा गांव एक परिवार की तरह मिलकर त्योहार मनाता था. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसमें भाग लेते थे. शाम होते-होते गांव का माहौल मेले जैसा हो जाता था.
रात में अलाव जलाकर उसके चारों ओर बैठकर होली गीत गाए जाते थे. ठंडी पहाड़ी रात में अलाव की गर्माहट और लोकधुनों की मिठास लोगों के दिलों को जोड़ती थी. आज भले ही समय बदल गया हो, लेकिन बुजुर्गों की यादों में पुराने जमाने की वह सादगी भरी होली आज भी जिंदा है. पहाड़ की वह होली सिर्फ रंगों का नहीं, बल्कि संगीत, मेल-मिलाप और अपनत्व का त्योहार हुआ करती थी.
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मैं रजनीश कुमार यादव, 2019 से पत्रकारिता से जुड़ा हूं. तीन वर्ष अमर उजाला में बतौर सिटी रिपोर्टर काम किया. तीन वर्षों से न्यूज18 डिजिटल (लोकल18) से जुड़ा हूं. ढाई वर्षों तक लोकल18 का रिपोर्टर रहा. महाकुंभ 2025 …और पढ़ें
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