खास बात यह है कि यह अमरूद लोकल बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी मांग बड़े शहरों में भी बनी हुई है. बेहतर गुणवत्ता और आकर्षक आकार के कारण गोविंद राम की फसल किसानों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है. नई तकनीक, सही किस्म और मेहनत के दम पर गोविंद राम आज अमरूद की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं और अन्य युवाओं को भी खेती की ओर प्रेरित कर रहे हैं.
बीही अमरूद की खासियत
गोविंद राम लोकल 18 को बताते हैं कि बीही (विनार किस्म) अमरूद का आकार सामान्य अमरूद की तुलना में काफी बड़ा होता है. एक फल का वजन करीब 300 से 400 ग्राम तक पहुंच जाता है. यही वजह है कि यह किस्म बाजार में अलग पहचान बना रही है और ग्राहकों को भी ज्यादा पसंद आ रही है.
युवा किसान ने बताया कि बीही अमरूद के पौधे नवंबर 2024 में लगाए गए थे और अब पौधों की उम्र करीब एक साल दो से तीन महीने हो चुकी है. गोविंद राम ने लगभग 50 डिसमिल (आधा एकड़) भूमि में कुल 250 पौधे लगाए हैं, जिनकी बढ़वार संतोषजनक बताई जा रही है.
रायपुर की नर्सरी से मंगवाए पौधे
पौधों की क्वालिटी को लेकर गोविंद राम ने कोई समझौता नहीं किया. उन्होंने बताया कि बीही अमरूद के पौधे रायपुर की बीएनआर नर्सरी से मंगवाए गए हैं. आसपास भी ऐसे पौधे मिल जाते हैं, लेकिन उनकी क्वालिटी और फल की गारंटी नहीं होती. स्थानीय पौधों में यह तय नहीं रहता कि फल बड़ा होगा या स्वाद में मीठा निकलेगा. इसी कारण उन्होंने वही पौधे चुने, जिन्हें पहले से अन्य किसानों ने लगाया था और जिनके परिणाम अच्छे मिले थे.
परिचित के बगीचे से मिली प्रेरणा
गोविंद राम बताते हैं कि बीही अमरूद की खेती का विचार उन्हें तब आया, जब वे एक परिचित अंकल के बगीचे में गए थे. वहां बीही अमरूद का बगीचा देखकर वे काफी प्रभावित हुए. इसके बाद उन्होंने पौधों की जानकारी ली और यह भी जाना कि पौधे कहां से मंगवाए गए थे. साथ ही उन्होंने उद्यान विभाग से भी जानकारी प्राप्त की, जहां से उन्हें बताया गया कि बीही अमरूद की खेती लाभकारी साबित हो सकती है.
शुरुआती लागत थोड़ी ज्यादा
लागत को लेकर गोविंद राम ने बताया कि शुरुआती व्यवस्था में खर्च थोड़ा अधिक आया. एक पौधे की कीमत करीब 400 रुपये पड़ी, क्योंकि पौधे बाहर से मंगवाए गए थे. हालांकि उनका मानना है कि अच्छी क्वालिटी के पौधों में किया गया निवेश भविष्य में बेहतर उत्पादन और मुनाफे के रूप में वापस मिलेगा.
अपने परिवार के बारे में बताते हुए गोविंद राम ने कहा कि परिवार बड़ा है, लेकिन फिलहाल उनके घर में चार सदस्य मां, पिता, वे स्वयं और उनकी पत्नी रहते हैं. परिवार की पूरी जिम्मेदारी उन्हीं पर है, इसलिए वे खेती को एक स्थायी आय का साधन बनाना चाहते हैं.
पढ़ाई के बाद नौकरी नहीं, खेती चुनी
गोविंद राम ने बताया कि उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद पॉलिटेक्निक से माइनिंग की पढ़ाई पूरी की. पढ़ाई के बाद उन्होंने नौकरी की तलाश भी की, लेकिन बाहर मिलने वाली नौकरी में 15 से 20 हजार रुपये की आमदनी उन्हें संतोषजनक नहीं लगी. उन्होंने सोचा कि इतनी आमदनी तो वे खेती से भी कमा सकते हैं, इसलिए बाहर नौकरी करने के बजाय खेती को ही आगे बढ़ाने का फैसला किया.
कम मेहनत, बेहतर विकल्प बनी अमरूद की खेती
गोबिंद ने कहा कि खेती से उनका लगाव शुरू से रहा है, क्योंकि उनके परिवार में पहले से खेती होती आ रही है. अमरूद की खेती उन्होंने इसलिए चुनी, क्योंकि इसमें मेंटेनेंस कम होता है और मेहनत भी टमाटर, खीरा या बैंगन जैसी सब्जियों की तुलना में कम लगती है. सब्जियों में देखरेख ज्यादा होती है और बाजार में दाम गिरने का जोखिम भी बना रहता है.
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