यह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में पैदावार अच्छी होगी और मुनाफा भी बेहतर मिलने की उम्मीद है. महिला किसान के दो बच्चे हैं और वह खेती के जरिए अपने परिवार के साथ-साथ बच्चों का भविष्य संवारना चाहती हैं. समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही तकनीकी सलाह से उन्हें खेती करना आसान हो गया है और जैविक आम की खेती को लेकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है. जैविक खेती की यह पहल न सिर्फ अन्य महिला किसानों के लिए प्रेरणा बन रही है, बल्कि क्षेत्र में टिकाऊ और लाभकारी खेती की दिशा में एक सकारात्मक कदम भी साबित हो रही है.
ऑर्गेनिक तरीके से शुरू की आम की खेती
महिला किसान अंजली यादव ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने आम की खेती पूरी तरह जैविक तरीके से शुरू की है. पौधों की रोपाई से पहले गड्ढों में गोबर खाद का उपयोग किया गया और किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक नहीं डाले गए. यह खेती कृषि विभाग की सलाह पर एक प्रयोग के तौर पर शुरू की गई थी, जो अब सफल होती दिख रही है.
पहली बार लगाई दशहरी किस्म, बौर और फल से बढ़ी मुनाफे
अंजली यादव ने बताया कि यह उनकी पहली बार आम की खेती है. उन्होंने दशहरी किस्म के आम के पौधे लगाए हैं. इस वर्ष पौधों में अच्छे से बौर आया है और छोटे-छोटे फल भी लगने लगे हैं. फिलहाल नियमित सिंचाई, निराई-गुड़ाई और घास-फूस हटाने का कार्य लगातार किया जा रहा है.
खेती में करीब दो से तीन ट्रैक्टर गोबर खाद का उपयोग किया गया है. गड्ढा खुदाई, पानी की व्यवस्था और मजदूरी सहित अब तक लगभग 12 से 13 हजार रुपये की लागत आई है. मुनाफा कितना होगा, यह फसल आने के बाद स्पष्ट होगा, लेकिन पौधों की स्थिति देखकर उन्हें अच्छी आमदनी की पूरी उम्मीद है.
पहले सब्जी और मक्का अब आम की ओर रुख
अंजली यादव ने बताया कि पहले वे अपने खेत में साग-सब्जी और मक्का की खेती करती थीं, जो अब भी आंशिक रूप से जारी है. आम की खेती का फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि उनके पास खाली जमीन और पर्याप्त पानी की सुविधा उपलब्ध थी. उन्होंने बताया कि वे नौवीं कक्षा तक शिक्षित हैं और चाहती हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें.
कृषि विशेषज्ञ राकेश कुमार राजवाड़े ने लोकल 18 को बताया कि दो साल पहले विभागीय फल-आम योजना के तहत अंजली यादव को दो हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 200 आम के पौधे उपलब्ध कराए गए थे. इनमें से 10 से 15 पौधों को चूहों से नुकसान हुआ, जबकि शेष पौधे पूरी तरह सुरक्षित और स्वस्थ हैं.
हेक्सागोनल पद्धति और हाई डेंसिटी तकनीक से रोपाई
राजवाड़े ने बताया कि इस बगीचे में दशहरी और लंगड़ा किस्म के आम लगाए गए हैं, जिनकी बाजार में अच्छी मांग रहती है. पौधों की रोपाई हेक्सागोनल पद्धति और अल्ट्रा हाई डेंसिटी तकनीक से की गई है. गड्ढों की खुदाई 1 मीटर लंबाई, चौड़ाई और गहराई में जेसीबी से कराई गई थी, जिससे पौधों का सर्वाइवल बेहतर रहा.
कृषि विशेषज्ञ के अनुसार आम के पौधों में तीसरे साल से फल आना शुरू हो जाता है और आने वाले वर्षों में उत्पादन लगातार बढ़ता है. फिलहाल सभी पौधे पूरी तरह स्वस्थ हैं और इस वर्ष अच्छी पैदावार की पूरी संभावना बनी हुई है.
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