दरअसल, फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन भद्रा और चंद्रग्रहण के कारण यह कंफ्यूजन और बढ़ गया है. कुछ लोग 2 मार्च को भद्रा की पुच्छ में होलिका दहन करने की बात कह रहे हैं, तो कुछ 3 मार्च को चंद्रग्रहण के सूतक से पहले या बाद में होलिका दहन की बात कर रहे हैं. ऐसे में लोगों के मन में प्रश्न है कि आखिर किस दिन होलिका दहन किया जाए और किस दिन रंगों वाली होली खेली जाए.
होलिका दहन की कथा
इस विषय पर जब लोकल 18 की टीम ने अंबाला की ज्योतिषाचार्य पंडित दीपलाल जयपुरी से बातचीत की, तो उन्होंने बताया कि होलिका दहन की कथा भगवान विष्णु के भक्त प्रह्लाद की महान गाथा से जुड़ी है, जो हमें भगवान के प्रति भक्ति और अटूट विश्वास की शक्ति का संदेश देती है.
उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में असुर राजा हिरण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानता था और चाहता था कि उसका पुत्र प्रह्लाद भी उसी की पूजा करे. लेकिन प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे. जब हिरण्यकश्यप के सभी प्रयास विफल हो गए, तो उसने अपनी बहन होलिका की सहायता ली, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था.
होलिका, हिरण्यकश्यप के कहने पर प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती हुई अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका जलकर भस्म हो गई. तभी से यह घटना इस सत्य का प्रतीक मानी जाती है कि अहंकार और अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य के सामने अंततः पराजित ही होता है.
होलिका दहन की तिथि
पंडित दीपलाल जयपुरी के अनुसार, शास्त्रों के मुताबिक फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5:56 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च की शाम 5:07 बजे तक रहेगी. हालांकि, भद्राकाल 2 मार्च की शाम 5:55 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की सुबह 5:28 बजे तक रहेगा. इसके अतिरिक्त 3 मार्च को चंद्रग्रहण भी लग रहा है, जिसकी अवधि दोपहर 3:27 बजे से शाम 6:47 बजे तक बताई जा रही है.
ऐसी स्थिति में उन्होंने सुझाव दिया कि 3 मार्च को चंद्रग्रहण समाप्त होने के बाद होलिका दहन और पूजन किया जा सकता है.
3 मार्च को चंद्रग्रहण और सूतक काल
उन्होंने बताया कि 3 मार्च को भारत में शाम के समय ग्रस्तोदित खंडग्रास चंद्रग्रहण लगेगा. इसे ग्रस्तोदित इसलिए कहा जाता है क्योंकि चंद्रमा उदय होते समय ही ग्रहणग्रस्त रहेगा. भारतीय समयानुसार ग्रहण दोपहर 3:27 बजे से शुरू होकर शाम 6:47 बजे तक रहेगा. यह ग्रहण शाम 6 बजे के बाद स्पष्ट रूप से दिखाई देगा. सूतक काल सुबह 9 बजे से प्रारंभ हो जाएगा. इस प्रकार ग्रहण की कुल अवधि लगभग 3 घंटे 20 मिनट होगी. यह चंद्रग्रहण भारत, ऑस्ट्रेलिया, प्रशांत महासागर क्षेत्र, एशिया तथा उत्तर एवं दक्षिण अमेरिका में दिखाई देगा.
मंत्रों का जाप
उन्होंने बताया कि ग्रहण काल को शास्त्रों में सावधानी का समय माना जाता है. इस दौरान सब्जियां नहीं काटनी चाहिए और भगवान शिव तथा चंद्रमा के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है. “ॐ नमः शिवाय” तथा “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः” मंत्रों का जाप किया जा सकता है.
क्या करें दान
चंद्रग्रहण समाप्त होने के बाद सफेद वस्तुएं जैसे दूध, दही, पनीर तथा लगभग 5.25 मीटर सफेद सूती कपड़ा किसी जरूरतमंद को दान करना लाभकारी माना गया है.
ग्रहण काल में क्या न करें
उन्होंने यह भी कहा कि ग्रहण काल में विशेषकर महिलाओं और बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए. गर्भवती महिलाओं को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. ग्रहण काल के दौरान खाने-पीने की वस्तुओं में तुलसी के पत्ते डाल देने चाहिए. ग्रहण समाप्त होने के बाद रसोई की सफाई कर ताजा भोजन बनाना उचित माना जाता है. इन सभी उपायों का पालन करने से किसी प्रकार की बाधा नहीं आती और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.