पिछोड़ा सिर्फ एक कपड़ा नहीं है, बल्कि इसे शुभता और अच्छे संस्कारों का प्रतीक माना जाता है.
पीले-नारंगी रंग और लाल बिंदुओं से होती है पहचान
पिछोड़ा आमतौर पर पीले या नारंगी रंग का होता है. इस पर लाल रंग से छोटे-छोटे बिंदु और साधारण डिजाइन बनाए जाते हैं. कुमाऊं में जब भी कोई शुभ काम होता है, जैसे शादी, पूजा-पाठ, नामकरण या त्योहार, महिलाएं पिछोड़ा जरूर पहनती हैं. मान्यता है कि पिछोड़ा पहनने से घर में सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है.
सदियों पुरानी है पिछोड़ा बनाने की परंपरा
पिछोड़ा बहुत पुराने समय से कुमाऊं की संस्कृति का हिस्सा रहा है. पहले के समय में पिछोड़ा पूरी तरह हाथ से बनाया जाता था. महिलाएं और कारीगर मिलकर इसे तैयार करते थे. इसमें काफी मेहनत लगती थी, लेकिन कपड़ा मजबूत और बेहद सुंदर बनता था.
समय के साथ मशीन से बने पिछोड़े भी बाजार में आने लगे. ये जल्दी तैयार हो जाते हैं और कीमत में भी सस्ते होते हैं.
हैंड प्रिंटेड पिछोड़े मशीन प्रिंट की तुलना में 2 से 3 गुना तक महंगे होते हैं. इसकी वजह यह है कि हैंड प्रिंट में हाथ से नक्काशी की जाती है और इसमें ज्यादा समय लगता है.
मशीन से बने प्रिंटेड पिछोड़े आमतौर पर 500 से 600 रुपये से शुरू हो जाते हैं, जबकि हैंड प्रिंटेड पिछोड़े की कीमत करीब 3000 रुपये से शुरू होती है.
अल्मोड़ा में आज भी जिंदा है हाथ से पिछोड़ा बनाने की कला
अल्मोड़ा आज भी इस परंपरा को संभाले हुए है. यहां के कारीगर आज भी पिछोड़ा हाथ से बनाते हैं. एक पिछोड़ा तैयार करने में करीब एक हफ्ते का समय लगता है. सबसे पहले कपड़े को धोकर साफ किया जाता है. फिर उसे पीले या नारंगी रंग में रंगा जाता है. इसके बाद लाल रंग से हाथ से डिजाइन बनाए जाते हैं. हर बिंदु बहुत ध्यान और मेहनत से तैयार किया जाता है.
हाथ से बना पिछोड़ा क्यों होता है ज्यादा खास
हाथ से बना पिछोड़ा ज्यादा मजबूत और टिकाऊ होता है. इसका रंग लंबे समय तक फीका नहीं पड़ता. यही वजह है कि आज भी लोग हाथ से बने पिछोड़े को ज्यादा पसंद करते हैं. हालांकि इसकी कीमत थोड़ी ज्यादा होती है, लेकिन इसकी मजबूती और सुंदरता इसे खास बना देती है.
आज के समय में नई पीढ़ी भी अपनी संस्कृति को समझने और अपनाने लगी है. शादी और त्योहारों में पिछोड़ा पहनना अब गर्व की बात माना जाता है. इससे परंपरा आगे बढ़ती है और कारीगरों को भी रोजगार मिलता है. पिछोड़ा उत्तराखंड की पहचान है. यह हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है और पुरानी परंपराओं की याद दिलाता है. अल्मोड़ा का हाथ से बना पिछोड़ा आज भी यह साबित करता है कि उत्तराखंड की संस्कृति पूरी तरह जिंदा है.
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