Uttarakhand Holi Celebration: उत्तराखंड के पहाड़ों में होली का त्योहार कभी केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक आत्मीयता और अटूट परंपराओं का उत्सव हुआ करता था. फाल्गुन की आहट मिलते ही गांव की चौपालों पर ढोल-दमाऊं की थाप गूंजने लगती थी और फाग के गीतों से पहाड़ की वादियां जीवंत हो उठती थीं. लेकिन आज वक्त की मार और बढ़ते पलायन ने इन खुशियों पर एक उदास परदा डाल दिया है. जिन गांवों में कभी सैकड़ों की भीड़ उमड़ती थी, वहां आज वीरानी छाई है और त्योहारों की रौनक अब बुजुर्गों की धुंधली होती यादों में सिमट गई है.
प्यार और अपनत्व की वो पुरानी होली
होली के दिन सुबह से ही लोग घर-घर जाते थे. अबीर-गुलाल लगाते, गले मिलते और बड़ों का आशीर्वाद लेते थे. गांव में आपसी प्यार और अपनापन साफ दिखाई देता था. महिलाएं पारंपरिक गीत गाती थीं और पुरुष ढोल की थाप पर नाचते थे. उस समय त्योहार का मतलब सिर्फ रंग लगाना नहीं, बल्कि साथ बैठकर खुशियां बांटना होता था.
पहले गांवों में लोगों की संख्या भी ज्यादा होती थी. एक-एक गांव में सैकड़ों लोग रहते थे. होली की महफिल में लगभग 200 लोग तक इकट्ठा हो जाते थे. अगर कोई गुड़ या मिठाई बांटता, तो सबमें थोड़ा-थोड़ा ही पहुंचता था. फिर भी सभी खुश रहते थे, क्योंकि त्योहार साथ मनाने की खुशी सबसे बड़ी होती थी.
बुजुर्गों की जुबानी पलायन की टीस
गांव की बुजुर्ग पुष्पा जोशी बताती हैं कि अब होली पहले जैसी नहीं लगती. पहले हर घर में लोग भरे रहते थे और देर रात तक गीत-संगीत चलता था. आज त्योहार जल्दी खत्म हो जाता है और पहले जैसी रौनक दिखाई नहीं देती. उन्होंने कहा कि अब गांव में लोग नहीं, हर त्योहार सूना-सूना लगता है.
इसी तरह भुवन जोशी कहते हैं कि पहले गांव में इतने लोग होते थे कि थोड़ी सी मिठाई भी सबमें बांटनी पड़ती थी. अब हाल यह है कि मिठाई बच जाती है, क्योंकि लोग कम हो गए हैं. उनका कहना है कि पलायन ने गांव की खुशियां कम कर दी हैं. वे कहते हैं कि लेकिन अभी भी वे अपनी संस्कृति बचाने के लिए पूरा प्रयास कर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ी भी इस चीज को सीखे.
संस्कृति बचाने की जद्दोजहद
पहाड़ी होली की पहचान उसकी सादगी और मिलजुलकर मनाने की परंपरा थी. ढोल-दमाऊं की थाप, फाग के गीत और चौपाल की महफिल ही उसकी असली जान थी. आज भी कुछ गांवों में यह परंपरा निभाई जा रही है, लेकिन पहले जैसा उत्साह कम दिखाई देता है. समय के साथ बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन पहाड़ी होली की यादें आज भी बुजुर्गों के दिल में जिंदा हैं. पुराने दिनों की वह हंसी, वह भीड़ और वह अपनापन अब यादों में बस गया है.
About the Author
सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.