इस बार के ब्लॉक समिति और जिला परिषद चुनावों में सियासी समीकरण अलग हैं। वजह यह है कि पंजाब सरकार का कार्यकाल 1 साल, 3 महीने और 14 दिन बाकी हैं। ऐसे में हर राजनीतिक दल इन चुनावों में अपनी सियासी पकड़ मजबूत करने में लगा है।
इस सियासत में सरपंचों को आकर्षित करने के लिए सभी दलों में दौड़ लगी है। अभी तक करतारपुर ब्लॉक, आदमपुर ब्लॉक और कैंट ब्लॉक में वर्तमान सरपंच-पंच और पुराने पंचायत सदस्यों की जॉइनिंग सभी दलों ने करवाई है।
ये चुनाव सभी दलों के लिए पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले का परीक्षण हैं। किसान आंदोलनों और ग्रामीण विकास के मुद्दों का इस चुनाव में कितना प्रभाव दिखता है, इस पर सभी दलों की नजर है। कांग्रेस: हलका प्रभारियों की साख का सवाल कांग्रेस में पंजाब के प्रधान का नाम तय होना है और इससे पहले सभी जिलों में प्रधानों का चुनाव हो चुका है।
ऐसे में जिला परिषद चुनाव कांग्रेस के विस हलका प्रभारियों, मौजूदा विधायकों और जिला प्रधानों की साख का सवाल है। हलकों में कांग्रेस का वोटिंग जहां प्रभावित होगा, वहीं पुराने नेताओं की टिकट की दावेदारी भी कमजोर होगी। जालंधर में कांग्रेस ने करतारपुर, कैंट, आदमपुर, फिल्लौर और शाहकोट हलकों में लीडरशिप पर जोर लगाया है।
टिकट वितरण में दिन-रात की कवायद जारी है। भाजपा: पहली बार चुनाव चिन्ह पर मैदान में अकाली-भाजपा गठबंधन में पहले भाजपा ने जिला परिषद चुनाव में अपना दबदबा नहीं दिखाया था। मेयर भाजपा के बनते थे, जबकि जिला परिषद के चेयरमैन अकाली दल के नेताओं को बनाया जाता था।
अब बदलते वक्त में भाजपा ने जिला परिषद चुनाव में अपने चुनाव चिन्ह के साथ एंट्री ली है। इसके दो मकसद हैं: हर बूथ पर अपने समर्थकों की मौजूदगी देखना और अपने वर्करों को सक्रिय करना। आप: विधानसभा चुनाव की पिच का टेस्ट आम आदमी पार्टी ने पंजाब की सत्ता में आने के बाद जालंधर में अपना मेयर बनाने के लिए लंबी कवायद की थी।
कांग्रेस और भाजपा के कौंसलरों को साथ लेकर उन्होंने सफलता हासिल की। अब जिला परिषद और ब्लॉक समितियों में एंट्री लेने की तैयारी है। सभी वरिष्ठ नेता मैपिंग में जुटे हैं। ये चुनाव आगामी विधानसभा चुनाव से पहले मैदान की पिच का टेस्ट हैं। पार्टी ने सभी विधानसभा हलकों में वोट बैंक के डेटा के आधार पर टिकट के दावेदारों की भविष्यवाणी भी तय कर रखी है।
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