अररिया में 13 साल पहले गायब हुआ नाबालिग बच्चा पड़ोसी देश म्यांमार से वापस लौट आया है। बौसी थाना क्षेत्र से लापता हुए इस बच्चे को दलालों ने न्यायालय के दबाव और मां के अथक संघर्ष के बाद अररिया पहुंचाया। पीड़िता जरीना खातून का बेटा मुन्ना उर्फ जमशेद वर्
गांव के ही तीन लोगों ने बेहतर शिक्षा और भविष्य का सपना दिखाकर उसे पहले बनारस ले जाने की बात कही। लेकिन बनारस से उसे ट्रेन द्वारा गुवाहाटी के पास कामाख्या लाया गया और फिर बस के माध्यम से पहाड़ों और जंगलों के रास्ते नागालैंड पहुंचाया गया। इसके बाद दलालों ने उसे पड़ोसी देश म्यांमार (वर्मा) भेज दिया।
मां ने 3 लोगों के खिलाफ किया था नामजद FIR
चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) के अध्यक्ष दीपक कुमार वर्मा ने बताया कि बच्चा 2012 में लापता हुआ था। परिजनों ने बौसी थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट के साथ नामजद एफआईआर दर्ज कराई थी। उस समय बच्चा नाबालिग था।
बच्चे की मां ने अपने बेटे की वापसी के लिए वर्षों तक संघर्ष किया और लगातार न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, माननीय कोर्ट ने इस मामले में कड़ी दबिश दी, जिसके परिणामस्वरूप मानव तस्कर दबाव में आ गए। दबाव में आए दलालों ने बच्चे को म्यांमार से वापस लाने की प्रक्रिया शुरू की। उसे नागालैंड होते हुए बस, टैंकर लॉरी और अन्य साधनों का उपयोग करके अररिया तक पहुंचाया गया।
युवक को परिजन को सौंपा जा रहा है।
काउंसलिंग के बाद परिजन को सौंपा गया बच्चा
दलालों ने लड़के को अररिया रेलवे स्टेशन (आरएस) पर छोड़ा, जहां से उसे एक ऑटो में बिठाकर आरोपी के गांव ले जाया गया। बौसी पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए लड़के को बरामद कर लिया। पुलिस ने हिरासत में लेकर बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया। सीडब्ल्यूसी ने बच्चे की काउंसलिंग की और उसे परिजनों को सौंप दिया।
लोहे की रॉड बनाने का करवाते थे काम
मुन्ना उर्फ जमशेद ने बताया कि उसे म्यांमार में एक ऐसी जगह रखा गया था, जहां चारों तरफ समुद्र और ऊंची दीवारें थीं। बीच में एक कंपनी थी, जहां लोहे की रॉड बनाने का काम होता था। पूरे परिसर में तीन गेट थे और हर गेट पर हथियारबंद गार्ड तैनात रहते थे। चारों ओर कैमरों से निगरानी की जाती थी, ताकि कोई भाग न सके।

13 साल बाद मां से मिला युवक।
घर जाने की बात पर करते थे पिटाई
जमशेद ने बताया कि वहां मजदूरों को जानवरों से भी बदतर हालात में रखा जाता था। जब वह घर जाने की बात करता तो उसके साथ बेरहमी से मारपीट की जाती थी। एक बार उसने भागने की कोशिश की, लेकिन पकड़े जाने के बाद उसकी इतनी पिटाई की गई कि शरीर में तीन जगह टांके लगाने पड़े। उसे साफ-साफ बताया गया कि उसे 16 लाख रुपए में बेच दिया गया है और जब तक यह रकम वसूल नहीं हो जाती, तब तक उसे घर जाने की इजाजत नहीं मिलेगी।
इतना ही नहीं, उसने यह भी खुलासा किया कि वहां घायल मजदूरों के शरीर से जबरन खून निकाला जाता था। जब कोई कमजोरी के कारण चक्कर खाकर गिरने लगता, तो उसे इंजेक्शन देकर फिर से काम पर लगा दिया जाता था। मां की याद में वह अक्सर सिसकता और रोता रहता था, लेकिन उसके दर्द को समझने वाला वहां कोई नहीं था।

CWC युवक की कर रही जांच।
सालों तक भटकती रही मां
दूसरी ओर, मां जरीना खातून की जिंदगी भी संघर्षों से भरी रही। बेटे के गायब होने के बाद उन्होंने बोसी थाना में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई और नामजद एफआईआर भी करवाई। लेकिन मामला सिर्फ पुलिस तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने वर्षों तक न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाईं। इस लड़ाई में उनकी जमीन-जायदाद तक बिक गई।
दलालों के डर और दबाव के कारण उन्हें अपना गांव छोड़कर दूसरी जगह शरण लेनी पड़ी। आखिरकार राजोखर में एक व्यक्ति ने उन्हें आश्रय दिया।
एक साल तक जेल में था आरोपी जावेद
जरीना खातून ने बताया कि इस मामले को लेकर उन्होंने पटना से लेकर दिल्ली तक कानूनी लड़ाई लड़ी। इसी दौरान जावेद नामक एक आरोपी को एक साल के लिए जेल भी भेजा गया। अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आरोपियों को कड़ी फटकार लगाई और बच्चे को प्रस्तुत करने का आदेश दिया।
न्यायालय ने तीन महीने का समय दिया, लेकिन जब तय अवधि में बच्चा पेश नहीं किया गया तो आरोपियों पर दबाव बढ़ा दिया गया। कोर्ट ने यहां तक कहा कि यदि बच्चा नहीं मिला तो आरोपियों की जमीन-जायदाद जब्त कर ली जाएगी। अदालत की इस सख्ती का असर आखिरकार दिखा। भारी दबाव के बाद दलालों ने म्यांमार से बालक को नागालैंड होते हुए भारत वापस लाया।
रास्ते में बस, टैंकर, लॉरी और अन्य साधनों का इस्तेमाल किया गया, ताकि किसी को भनक न लगे। आखिर में उसे अररिया रेलवे स्टेशन पर एक ऑटो में बैठाकर घर की ओर भेज दिया गया।
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