Kadjhoi Recipe : पहाड़ों में पहले संसाधन सीमित थे. दूध-दही जल्दी खराब न हो, इसलिए लोग उन्हें उबालकर इस्तेमाल करते थे. यही आदत आगे चलकर परंपरा बन गई और कड़झोई का जन्म हुआ. कम सामग्री में, कम खर्च में तैयार होने वाली ये डिश आज भी गांवों में उसी प्यार से बनाई जाती है. यह सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि पहाड़ के संघर्ष और समझदारी की पहचान है.
उत्तराखंड के कुमाऊं में सर्दियों के मौसम में एक अनोखी डिश खाई जाती है, जिसका नाम है कड़झोई. यह दही को उबालकर तैयार की जाती है. सुनने में साधारण लगने वाली ये डिश पहाड़ में सुकून देने वाले भोजन की तरह जानी जाती है. न इसमें मसाले ज्यादा होते हैं और न कोई भारी सामग्री. एक कटोरी गर्म कड़झोई ठंड में शरीर के लिए बेहद आरामदायक मानी जाती है.

कड़झोई की खासियत है कि इसे बनाने में सिर्फ तीन चीजें लगती हैं. दही, हल्का नमक और थोड़ी सी हल्दी. दही में थोड़ा पानी मिलाकर इसे धीमी आंच पर उबाला जाता है ताकि दही फटे नहीं. इस डिश में कोई तड़का नहीं लगता और न कोई भारी मसाला. इसकी सादगी पहाड़ की रसोई की देसी समझ और परंपरा को दर्शाती है, जहां स्वाद सादगी से पैदा होता है.

पहाड़ों में ठंड बहुत तेज होती है और ऐसे समय में कड़झोई शरीर को गर्म रखने में मदद करती है. उबला हुआ दही पाचन के लिए हल्का माना जाता है. लोगों का मानना है कि सर्दियों में कच्चा दही पेट पर असर डाल सकता है, लेकिन उबला दही फायदेमंद होता है. यही कारण है कि गर्म-गर्म कड़झोई रोटी या उबले चावल के साथ खाई जाती है और इसे स्वास्थ्य के लिए अच्छा माना जाता है.
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कड़झोई का स्वाद न ज्यादा खट्टा होता है और न ज्यादा नमकीन. इसका हल्का खट्टापन और गर्माहट इसे पहाड़ का कम्फर्ट फूड बनाते हैं. यह बिल्कुल किसी सूप जैसी लगती है, जिसे बच्चे, बुजुर्ग, बीमार और स्वास्थ्य-सचेत लोग आसानी से खा सकते हैं. इसका सादापन ही इसका स्वाद है, जो सर्दियों में थके हुए शरीर और पेट को राहत देता है.

कड़झोई को रोटी और चावल दोनों के साथ खाया जाता है. कई घरों में इसके ऊपर घी में जीरे का हल्का तड़का लगाया जाता है, लेकिन पारंपरिक तरीके में कोई तड़का नहीं डाला जाता. कुमाऊं के गांवों में लोग इसे बिल्कुल साधारण रूप में खाना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि यही इसका असली स्वाद है. यह सादगी ही कड़झोई का असली आकर्षण है.

शहरी लाइफस्टाइल, फास्ट फूड और पैक्ड खाने के कारण आज की नई पीढ़ी कड़झोई जैसी देसी विरासत से दूर होती जा रही है. कई पहाड़ी युवा इस डिश के बारे में जानते तक नहीं, जबकि यह कभी हर घर में ठंड के दिनों में बनी करती थी.

पहाड़ों में पहले संसाधन सीमित थे. दूध-दही जल्दी खराब न हो, इसलिए लोग उन्हें उबालकर इस्तेमाल करते थे. यही आदत आगे चलकर परंपरा बन गई और कड़झोई का जन्म हुआ. कम सामग्री में, कम खर्च में तैयार होने वाली यह डिश आज भी प्यार से बनाई जाती है.