Green Peas Cultivation: हरे मटर की खेती में समय पर रोग पहचान और सही दवा छिड़काव से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. मटर में पत्तियों का पीला पड़ना, सफेद पाउडर जमना या फलियों में छेद जैसे लक्षण रोग के संकेत हैं. कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, फसल की नियमित निगरानी, संतुलित खाद, समय पर सिंचाई और साफ-सफाई से मटर की फसल को रोगों से बचाया जा सकता है.
जांजगीर-चांपा कृषि विज्ञान केंद्र में पदस्थ कृषि वैज्ञानिक एवं पादप रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष प्रधान ने ठंड के मौसम में मटर एवं तिवड़ा (तेवरा) फसल में लगने वाले प्रमुख रोगों और उनके प्रभावी नियंत्रण के उपायों की जानकारी दी उन्होंने बताया कि इस मौसम में मटर और तिवड़ा की खेती में पानी की आवश्यकता कम होती है, इसलिए खेत में जलभराव की स्थिति से बचना बेहद जरूरी है, अधिक नमी होने पर फसलों में रोग लगने की संभावना बढ़ जाती है.
सबसे आम रोग चूर्णी फफूंद
डॉ. प्रधान ने बताया कि मटर और तिवड़ा में सबसे आम रोग चूर्णी फफूंद (पाउडरी मिल्ड्यू) है, इसके लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह पर सफेद चूर्ण जैसा पाउडर दिखाई देना है, जिससे प्रकाश संश्लेषण बाधित होता है और उपज में भारी गिरावट आती है, इसके नियंत्रण के लिए किसान 0.2 प्रतिशत सल्फर का छिड़काव कर सकते हैं, साथ ही आधुनिक कवकनाशी पेनकोनाजोल 10 प्रतिशत का उपयोग 200 मिलीलीटर प्रति एकड़ या 0.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से करने की सलाह दी गई है. उन्होंने बताया कि वर्तमान मौसम में 15 से 28 डिग्री तापमान, नम वातावरण और शुष्क हवा चूर्णी फफूंद के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाती हैं.
डॉ प्रधान ने बताया कि इसके अलावा मटर में डाउनी मिल्ड्यू (मृदु रोमिल आसिता) रोग भी देखने को मिलता है, इसके लक्षण पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले धब्बे और निचली सतह पर धूसर रंग की फफूंद दिखाई देना है, इसके नियंत्रण के लिए मेटालेक्सिल 8% + मैनकोजेब 64% का मिश्रण 2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई है. डॉ. प्रधान ने बताया कि कभी-कभी मटर में रस्ट (गिरवा) रोग भी देखने को मिलता है, जिसे उपयुक्त कवकनाशियों जैसे मेटालेक्सिल आदि के छिड़काव से नियंत्रित किया जा सकता है.
उन्होंने आगे बताया कि मटर में एक अन्य गंभीर रोग एस्कोकाइट ब्लाइट भी पाया जाता है, इसके प्रभावी नियंत्रण के लिए एजोक्सीस्ट्रोबिन 18.5 प्रतिशत का 1 से 1.5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने पर बेहतर परिणाम मिलते हैं, कृषि वैज्ञानिक ने किसानों से समय पर रोग की पहचान कर सही दवा और उचित मात्रा में छिड़काव करने की अपील की है, ताकि फसल स्वस्थ रहे और उत्पादन पर किसी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.
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