दूसरा रास्ता कैथन नदी से होकर गुजरता है, जहां साल भर तीन से चार फीट पानी भरा रहता है। मजबूरी में ग्रामीण इसी नदी के पानी से होकर बच्चों को स्कूल, मरीजों को इलाज और जरूरी कामों के लिए बाहर ले जाते हैं।
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गांव में एंबुलेंस पहुंचना नामुमकिन
हालात ये हैं कि किसी के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की स्थिति में यहां एंबुलेंस का पहुंचना नामुमकिन है, ऐसे में ग्रामीण खटिया का सहारा लेते हैं। नदी पार कर मरीज को कंधों पर उठाकर ले जाना यहां आम बात हो गई है। बारिश के दिनों में जब कैथन नदी ऊफान पर होती है, तब पूरा गांव मानो टापू बन जाता है और लोग बाहर निकलने में पूरी तरह असहाय हो जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार कलेक्ट्रेट पहुंचकर ज्ञापन सौंपा लेकिन आज तक समस्या का समाधान नहीं हुआ। गांव में न अधिकारी आते हैं, न ही कोई जनप्रतिनिधि हालचाल लेने पहुंचता है। ग्रामीणों का आरोप है कि केवल चुनाव के समय नेता बड़ी-बड़ी गाड़ियों से गांव तक पहुंच जाते हैं, लेकिन उसके बाद पांच साल तक कोई नजर नहीं आता।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी अगर लोगों को सुरक्षित रास्ता तक न मिले, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। रुसली घाट टपरा के रहवासी आज भी एक पक्के रास्ते, बुनियादी सुविधाओं और सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हैं।
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