गनौली वन क्षेत्र के रेंजर राजकुमार पासवान बताते हैं कि कक्ष संख्या टी-22 में मौजूद ऊंचे-ऊंचे सेमल के पेड़ों पर प्रतिदिन 40 से 50 गिद्धों को देखा जाता है. यह पेड़ गिद्धों का आश्रय स्थल बन चुके हैं. मजे की बात यह है कि गिद्धों के आश्रय को चिन्हित कर विभाग द्वारा वहां मृत पशुओं को उनके….
गिद्धों के संरक्षण केंद्र का निर्माण
इस संबंध में वाल्मीकि टाइगर रिजर्व डिविजन 2 के डीएफओ विकास अहलावत बताते हैं कि गनौली वन क्षेत्र के कक्ष संख्या टी-22 में वन विभाग की अतिक्रमित भूमि को एक माह पूर्व मुक्त कराया गया था. अब उसी भूमि पर गिद्धों के संरक्षण से जुड़ी आवश्यक सुविधाओं का निर्माण कार्य तेजी से पूरा किया जा रहा है. इसका उद्देश्य गिद्धों को सुरक्षित आवास, भोजन और अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराना है.
150 से अधिक गिद्धों का निवास
गनौली वन क्षेत्र के रेंजर राजकुमार पासवान बताते हैं कि कक्ष संख्या टी-22 में मौजूद ऊंचे-ऊंचे सेमल के पेड़ों पर प्रतिदिन 40 से 50 गिद्धों को देखा जाता है. यह पेड़ गिद्धों का आश्रय स्थल बन चुके हैं. मजे की बात यह है कि गिद्धों के आश्रय को चिन्हित कर विभाग द्वारा वहां मृत पशुओं को उनके आहार के रूप में रखा जाता है, जिससे उनकी संख्या अब 150 तक पहुंच चुकी है. बस, इसी का अनुसरण करते हुए वन विभाग ने आसपास के ग्रामीणों से अपील की है कि पालतू पशुओं की मृत्यु होने पर उन्हें इधर-उधर न फेंक उसकी सूचना वन विभाग को दें.
नेपाल से भोजन की तलाश में पहुंचते हैं वीटीआर
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फ्रेडरेशन के फील्ड बायोलॉजिस्ट सौरभ वर्मा बताते हैं कि गनौली वन क्षेत्र में आने वाले अधिकतर गिद्ध नेपाल से भोजन की तलाश में वीटीआर पहुंचते हैं. उनकी संख्या और उपस्थिति को देखते हुए उन्हें स्थायी रूप से वीटीआर में ही बसाने की कोशिश की जा रही है. साथ ही उनके सहूलियत के लिए वाटर होल का निर्माण भी कराया जा रहा है. इतना ही नहीं, गिद्धों की निगरानी के लिए हार्डिंग स्पॉट और लोगों की जागरूकता के लिए प्रशिक्षण केंद्र बनवाए जा रहे हैं.
दुर्लभ प्रजाति के गिद्धों का बसेरा
बताते चलें कि वाल्मीकि टाइगर रिजर्व डिविजन 02 के गनौली रेंज से सटे चम्पापुर, सखुवनवा, धूमवाटांड, बनकटवा, महादेवा और रूपनगर सहित अन्य कई क्षेत्रों में गिद्धों के देखे जाने की पुष्टि हुई थी. बात यदि उनके प्रजातियों की करें तो गनौली रेंज में हिमालयन ग्रिफन, व्हाइट रंप्ड, इंडियन गिद्ध, रेड हेडेड, यूरेशियन ग्रिफन, इजिप्शियन, सिनेरियस और स्लेंडर-बिल्ड जैसी कई दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है.
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