Mangalchu Lake Uttarakhand: उत्तराखंड की धरती अपने आंचल में न जाने कितने रहस्य और चमत्कार समेटे हुए है. यहां की वादियों में स्थित ताल और बुग्याल न केवल अपनी सुंदरता के लिए जाने जाते हैं, बल्कि अपनी अनोखी विशेषताओं के लिए भी दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं.इन्हीं में से एक है उत्तरकाशी जिले का मंगलाछु ताल, जिसे ‘बोलने वाला ताल’ या ‘ताली बजाने वाला ताल’ भी कहा जाता है.
मंगलाछु ताल उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के भटवाड़ी ब्लॉक में स्थित है. यह समुद्र तल से लगभग 12,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. यह ताल घने जंगलों और मखमली बुग्यालों (घास के मैदानों) के बीच छिपा हुआ है. पर्यटन की दृष्टि से यह क्षेत्र अभी भी बहुत शांत है, जहाँ प्रकृति अपने शुद्धतम रूप में दिखाई देती है.

इस ताल की सबसे बड़ी खासियत इसका “प्रतिक्रिया देना” है, जैसे ही कोई व्यक्ति इस ताल के किनारे खड़े होकर ताली बजाता है या सीटी मारता है, वैसे ही ताल के शांत पानी के अंदर से छोटे-छोटे बुलबुले उठने लगते हैं.ऐसा लगता है मानो ताल आपकी आवाज का जवाब दे रहा हो. जितनी तेज आवाज होती है, बुलबुलों की गति भी उतनी ही बढ़ जाती है.

स्थानीय भाषा में ‘मंगला’ का अर्थ ‘खुशी’ या ‘मंगल’ और ‘छु’ का अर्थ ‘पानी’ होता है. स्थानीय लोग इसे एक पवित्र स्थल मानते हैं. मान्यता है कि हिमाचल प्रदेश के कुल्लू से सोमेश्वर देव की डोली यहाँ लाई गई थी और यहीं उन्हें स्नान करवाया गया था. उस वक्त से ही यह जगह स्थानीय लोगों के लिए बहुत पवित्र और पूजनीय बन गया है. ग्रामीण यह भी मानते हैं कि अगर किसी साल बारिश कम होती है तो ग्रामीण यहां पूजा करते हैं, जिससे बारिश हो जाती है.
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यहां आने वाले पर्यटक ताली या सीटी बजाते हैं तो बुलबुले होते हैं. भक्त इसे चमत्कार मानते हैं, लेकिन वैज्ञानिक इसके पीछे भूगर्भीय कारणों को देखते हैं. जानकारों का मानना है कि ताल की तलहटी में गैसों का भंडार हो सकता है. जब बाहर ध्वनि तरंगें पैदा होती हैं, तो उनके कंपन से पानी के नीचे दबी गैसें बाहर निकलने लगती हैं, जो सतह पर बुलबुलों के रूप में दिखाई देती हैं.

मंगलाछु ताल के आसपास का वातावरण इतना शांत है कि यहां पक्षियों की चहचहाहट भी साफ सुनाई देती है. एक खास बात यह है कि इस ताल का पानी हमेशा साफ रहता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि अगर कोई पत्ता ताल में गिरता है, तो पक्षी उसे उठाकर बाहर फेंक देते हैं, जिससे यह पवित्र जलाशय हमेशा निर्मल बना रहता है.

मंगलाछु ताल तक पहुंचने के लिए उत्तरकाशी से भटवाड़ी और फिर संगमचट्टी होते हुए पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है. यह रास्ता घने बांज और बुरांश के जंगलों से होकर गुजरता है. ट्रैकर्स के लिए यह एक शानदार अनुभव होता है क्योंकि रास्ते में हिमालय की बर्फीली चोटियों के दीदार होते हैं और प्रकृति की अनछुई सुंदरता देखने को मिलती है.

यह क्षेत्र न सिर्फ प्राकृतिक रूप से समृद्ध है, बल्कि यहां की संस्कृति भी बेहद दिलचस्प है. इस ताल की यात्रा के दौरान आपको स्थानीय पहाड़ी जीवनशैली, पत्थर के बने पुराने घर और देवदार के पेड़ों के बीच बसे छोटे-छोटे गांव देखने को मिलेंगे. यहां के लोग अपनी परंपराओं और इस ताल की पवित्रता को लेकर बहुत संवेदनशील हैं. सर्दियों में यह क्षेत्र भारी बर्फबारी की चपेट में रहता है. यहां जाते समय ध्यान रखें कि ताल की पवित्रता भंग न हो और शांति बनाए रखें, ताकि आप उस रहस्यमयी ‘जवाब’ को महसूस कर सकें जो यह ताल अपनी लहरों से देता है.
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