लाल पगड़ियों और सजे-धजे कपड़ों में आधी रात को हाथों में तलवारें लिए लोग खड़े थे। चारों तरफ आग उगलती तोपें थीं। एक के बाद एक बारूद के धमाके हुए, बंदूकों से गोलियां चलती रही। माहौल ऐसा था जैसे कोई महायुद्ध छिड़ गया हो। यह सब राजस्थान के उदयपुर से 45 किलोमीटर दूर उदयपुर-चित्तौड़गढ़ नेशनल हाईवे पर स्थित मेनार गांव में बुधवार की पूरी रात हुआ। उदयपुर में करीब 451 साल पहले मुगल चौकी ध्वस्त करने की खुशी में मेनारिया ब्राह्मण समाज ने बारूद की होली खेली। तब से हर साल होलिका दहन के 48 घंटे बाद यानि तीसरी रात (जमरा बीज) को यह आयोजन होता । इस दौरान युवाओं के साथ बुजुर्गों ने तोपों से लगातार बारूद के धमाके किए। ढोल-दुंदुभि बजाए गए। तलवारों से गैर डांस किया गया। मशाल लेकर गांव के रास्तों की मोर्चाबंदी हुई, जिसको देखने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश और विदेशों तक से लोग मेनार गांव पहुंचे। योजना बनाकर छावनी ध्वस्त की मेनार गांव के दर्ज इतिहास के मुताबिक मेवाड़ में महाराणा अमर सिंह के साम्राज्य के दौरान जगह-जगह मुगलों की छावनियां (सेना की टुकड़ियां) बनी हुई थीं। मेनार गांव के पूर्वी छोर पर भी मुगल छावनी थी। छावनी के आतंक से लोग परेशान थे। मेनारिया ब्राह्मण भी मुगल छावनी के आतंक से त्रस्त थे। मेनार वासियों को वल्लभनगर छावनी पर जीत का समाचार मिला तो गांव के लोग ओंकारेश्वर चबूतरे पर जुटे और छावनी पर हमले की रणनीति बनाई। इसके बाद हमला कर मुगल छावनी को ध्वस्त कर दिया। चारों तरफ भीड़, धमाके, जोश और गर्व मेनार गांव में जमरा बीज की रात का माहौल किसी युद्ध स्थल से कम नहीं था। चारों तरफ भीड़। पैर रखने की जगह नहीं थी। गांव के लोगों ने सेना वाली पोशाक पहनी थी। हाथों में मशाल और तलवारें थी। टुकड़ियां जब बारूद की होली खेलने गांव के ओंकारेश्वर चौक पहुंचीं तो शोर मच गया। रोम-रोम में रोमांच दौड़ गया। देखते ही देखते तोपें बारूद उगलने लगीं। पटाखों की गूंज हर तरफ फैल गई। गोलियां चलने लगीं। दुंदुभि बजाकर जीत का ऐलान किया गया और फिर तलवारों से गेर डांस शुरू हुआ। मुगल चौकी पर जीत के बाद से मेनारिया समाज हर साल यह होली मनाताा है। खास बात ये है कि इसमें रंग से ज्यादा बारूद का इस्तेमाल होता है। परंपरा निभाई, जाजम बिछाकर की मेहमान नवाजी बुधवार को (5 मार्च) दोपहर ऐतिहासिक बारूद की होली की शुरुआत हुई। सबसे पहले गांव के ओंकारेश्वर मंदिर के चौक में शाही लाल जाजम बिछाई गई। गांव और आसपास के इलाकों से यहां पहुंचे मेनारिया ब्राह्मण समाज के पंचों, मौतवीरों (बुजुर्ग) का स्वागत किया गया। उनकी मेहमान नवाजी की गई। इसके बाद गांव के जैन समाज के लोगों ने अबीर-गुलाल बरसाना शुरू किया। सभी लोग आपस में गले मिले और होली की शुभकामनाएं दीं। दुबई से भी लोग मेनार पहुंचे इस बारूद की होली को देखने के लिए शनिवार शाम तक राजस्थान के कई शहरों के अलावा मध्यप्रदेश के रतलाम, नीमच, मंदसौर, गुजरात के अहमदाबाद, सूरत, महाराष्ट्र के मुंबई और दुबई से लोग यहां पहुंचे। रात तक उदयपुर-चित्तौड़गढ़ नेशनल हाईवे पर गाड़ियां पार्क की गई। करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर लोग आयोजन स्थल तक पहुंचे। गांव के 5 रास्तों की मोर्चाबंदी की गई रात 10:15 बजे के बाद रस्में शुरू हुईं। पूर्व रजवाड़ों के सदस्य सैनिकों की पोशाक धोती-कुर्ता और कसुमल पाग (साफा) बांधे तलवारें और बंदूकें लेकर घरों से निकले। अलग-अलग रास्तों से ललकारते हुए वे गोलियां दागते-तलवारें लहराते हुए ओंकारेश्वर चौक पहुंचे। यहां चबूतरे पर गांव के 5 रास्तों की मोर्चाबंदी का आदेश दिया गया। पांच टुकड़ियां 5 मशालें लेकर ढोल की थाप पर गांव की मोर्चाबंदी करने के लिए रवाना हो गईं। पांचों दलों ने शोर करते हुए जब एक साथ कूच किया तो रोमांच चरम पर पहुंच गया। हजारों लोग इस नजारे के गवाह बने। जीत की शौर्य गाथा पढ़ी इसके बाद महिलाएं सिर पर मंगल कलश रखकर और पुरुष आतिशबाजी करते हुए बोचरी माता की घाटी पहुंचीं। वहां मुगल चौकी पर जीत की शौर्य गाथा पढ़ी गई। यहां थंभ चौक पर महिलाओं ने मुख्य होली को ठंडा करने की रस्म निभाई। महिलाओं ने गाए वीर रस के गीत इसके बाद ढोल-नगाड़ों के साथ आगे टुकड़ियां और पीछे महिलाएं ओंकारेश्वर चौक की तरफ रवाना हुई। इस दौरान तलवार और लकड़ी लेकर गेर नृतकों ने डांस किया। हैरतअंगेज करतब दिखाए गए। महिलाएं वीर रस के गीत गा रही थीं। सभी के ओंकारेश्वर चौक पहुंचने पर बारूद की होली शुरू हुई। पांचों टुकड़ियों के योद्धाओं ने एक साथ हवाई फायर किए। आतिशबाजी की गई। तोपों में बारूद भरकर धमाके किए गए। इस वक्त ऐसा नजारा सामने था जैसे युद्ध का क्षेत्र हो या फिर बॉर्डर पर आ गए हों। मेनार की बारूद की होली में हिस्सा लेने लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे। दुबई में रहने वाले मेनारिया समाज और गांव के लोग भी कुछ दिन पहले ही यहां पहुंचे थे। हालांकि कई लोग इस बार इजरायल-ईरान युद्व के चलते फ्लाइट बंद होने से नहीं आ पाए। गांव के लोग खानदानी शेफ, दुबई से आयोजन के लिए आते मेनार के कई लोग और युवा विदेशों में और देश के कई राज्यों में खानदानी शेफ हैं। शेफ का काम करने वाले युवाओं ने बताया कि होली का त्योहार आते ही वे गांव लौट आते हैं। लोगों ने बताया कि आयोजन में भाग लेकर वे गौरवान्वित महसूस करते हैं। उदयपुर से होली देखने गए कैलाश नागदा ने बताया कि इंटरनेट पर मेनार की बारूद की होली का देखा और सुना था। परिवार के साथ मन था कि जाकर देखेंगे। जब पूरी रात यहां आकर नजारे देखे तो बहुत मजा आया। गांव को दुनिया जानने लगी गांव के बुजुर्ग ओंकारलाल मेनारिया ने बताया कि समय के साथ गांव में इस परंपरा में जोश बढ़ा है। परिवार की बेटों के साथ बेटियां भी इस त्यौहार पर बढ़कर भाग लेने लगी हैं। पिछले कुछ सालों में इंटरनेट के प्रचार से हमारे गांव को पूरी दुनिया जानने लगी है। जब हम राजस्थान के किसी भी शहर या भले मुबंई में लोगों से मिलते और अपने परिचय के साथ गांव का नाम बोलते है। तब लोग बहुत सम्मान देते है। हमारे गांव के लिए हर एक व्यक्ति के लिए यह पल किसी मेडल से कम नहीं है। स्थानीय निवासी ओम मेनारिया ने बताया कि जब से समझ विकसित हुई है, तब से जोश से यह त्योहार मनाते हैं। इस दिन को लेकर हम हमारे पूर्वजों पर बहुत गर्व महसूस करते हैं। लगता है बॉर्डर पर हैं। फोटोज में देखिए बारूद की होली का नजारा… वीडियो : ताराचंद गवारिया।
इनपुट सहयोग : सुरेश मेनारिया, मेनार।
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