कहने के लिए होली का त्योहार रंगों का होता है, लेकिन काली कुमाऊं की खड़ी होली अपने आप में विशेष पहचान रखती है। संगीत सुरों के बीच बैठकी होली के भक्ति, श्रंगार, संयोग, वियोग से भरे गीत गाने की परंपरा काली कुमाऊं अंचल के गांव-गांव में चली आ रही है।
होली का यह शास्त्रीय रूप 15वीं शताब्दी में चंद राजाओं के काल में चंपावत में विकसित हुआ। यह कुमाऊंनी संगीत और ब्रज की परंपराओं का मिश्रण है। यह होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि वैष्णव भक्ति, लोक आस्था और सामूहिक एकता का प्रतीक है। एकादशी को रंगों की शुरुआत के बाद गांव-गांव में ढोल-झांझर और पैरों की विशेष कदम ताल के साथ खड़ी होली गायन चलता है। इसी दिन चीर बंधन के साथ शिव स्तुति से होली गायन शुरू किया जाता है।
इसमें शिव के मन माहि बसे काशी, हरि धरै मुकुट खेले होरी… आदि शामिल है। आध्यात्मिक रसों, भक्ति, शृंगार आदि से जुड़ीं होलियों का गायन छरड़ी तक किया जाता है। इसके अलावा परिवार, समाज में होने वाली विभिन्न घटनाओं, स्त्री पुरुष प्रसंग, हास्य ठिठोली से भरी होलियां भी गाई जाती हैं।
इतिहासकार देवेंद्र ओली ने बताया कि हर होली गीत से छलकता है अलग रंग हम घर पिया परदेश, बदरिया जन बरसों, पश्चिम दिशा घनघोर बदरिया जन बरसों होली गीत में जहां जोबन की ज्वाला में दहक रही यौवना प्रकृति से विनय करते दिखती है तो वहीं पतली कमर, लंबे केश, सुघड़ जल भरन चली पनघट पर गीत से नारी के शृंगार और सौंदर्य का बखान करते हैं।
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