राजधानी की फिजा हर साल सर्दियों में दमघोंटू और बीमार हो जाती है। इसकी बड़ी वजह सार्वजनिक परिवहन के अपर्याप्त विकल्प, बढ़ती निजी वाहनों की संख्या और भारी वाहनों और पुराने डीजल इंजनों से निकलने वाला धुआं भी है। वाहनों की बेहतरतीब संख्या ने राजधानी की हवा को दमघोंटू बना दिया है। टेरी, सीएसई समेत अन्य संगठन की कई रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है कि दिल्ली की बयार को प्रदूषित करने का मुख्य कारक वाहनों से होने वाला प्रदूषण है।
पर्यावरण विशेषज्ञों का भी कहना है कि सिर्फ उद्योग या खुले धुएं को ही प्रदूषण का कारण मानना गलत है। दिल्ली की ट्रैफिक और परिवहन व्यवस्था ने भी हवा को सांस लेने के लिए खतरनाक बना दिया है। अगर सही नीतियां और तकनीकी सुधार समय पर लागू नहीं किए गए तो शहरवासियों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।
उन्होंने हिदायत दी है कि सख्त परिवहन नीति, वाहन अपग्रेड और ई-वाहनों को बढ़ावा देना जरूरी है। इसी कड़ी में रविवार को दिल्ली में वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए निर्णय सहायता प्रणाली के अनुसार, वाहन से होने वाला प्रदूषण 18.217 फीसदी रहा। पेरिफेरल उद्योग से 8.47, आवासीय इलाकों से 4.64, निर्माण गतिविधियों से 2.28, कूड़ा जलाने से 1.67, रोड से उड़ने वाली धूल से 1.23 और पराली की 0.18 फीसदी भागीदारी रही।
चीन से चांदनी चौक…
चीन से लेकर चांदनी चौक तक यही स्थिति है लेकिन, पड़ोसी देश ने अपनी अच्छी नीतियों और मजबूत इच्छा शक्ति की बदौलत प्रदूषण पर काबू पा लिया है। बीजिंग में वायु प्रदूषण नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत 1998 में हुई और इसे तीन चरणों में लागू किया गया। पहले दो चरणों में कोयले की खपत, औद्योगिक और वाहन उत्सर्जन जैसे मुख्य प्रदूषकों पर ध्यान दिया गया, जबकि 2013-2017 के दौरान खास तौर पर पीएम2.5 को नियंत्रित करने पर फोकस किया गया।
प्रदूषण की निगरानी के लिए बीजिंग में लगभग 1,000 पीएम2.5 सेंसर लगाए गए, जिनसे वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) की गणना की जाती है। इधर, दिल्ली में वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए करीब 40 पीएम2.5 सेंसर लगाए गए हैं और पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण ने 1998 से सड़क की धूल, वाहन प्रदूषण और डीजल जनरेटर पर नियंत्रण के आदेश जारी किए हैं। सर्दियों के लिए विशेष निर्देश भी दिए गए। वर्ष 2000 से ग्रेप को तर्कसंगत बनाया गया लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
वायु प्रदूषण कम करने के लिए उठाए गए कदम…
कोयले से होने वाले प्रदूषण : कोयले से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए बदरपुर थर्मल पावर स्टेशन को अक्तूबर 2018 में स्थायी रूप से बंद कर दिया गया, हालांकि इसके प्रभाव पर कोई विस्तृत अध्ययन नहीं हुआ। राजधानी की सभी 1,959 पंजीकृत औद्योगिक इकाइयां अब 100 प्रतिशत पीएनजी पर चल रही हैं और एनसीआर के 240 औद्योगिक क्षेत्रों में से 224 में पीएनजी ढांचा उपलब्ध है।
वाहनों से होने वाले प्रदूषण: वाहनों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पुरानी गाड़ियों पर रोक लगाई गई, हालांकि इस पर कानूनी विवाद जारी है और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बीएस-IV वाहनों पर लगी पाबंदी हटाई है। दिल्ली सरकार की ईवी पॉलिसी 2020 के तहत ई-साइकिल, ई-रिक्शा, दोपहिया और हल्के व्यावसायिक इलेक्ट्रिक वाहनों पर सब्सिडी दी जा रही है, जबकि नई ईवी पॉलिसी 2.0 का प्रस्ताव भी तैयार है।
निजी कार: सीएनजी वाहनों को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया जाता, लेकिन ग्रेप के दौरान इन्हें प्रतिबंधों से छूट मिलती है। निजी कारों की खरीद पर फिलहाल कोई रोक नहीं है और ऑड-ईवन योजना को केवल आपातकालीन उपाय के रूप में लागू किया गया था।
स्रोत: यूएन एनवायरनमेंट की 2019 की रिपोर्ट, सीपीसबी, टेरी, आईआईटी कानपुर की दिल्ली के लिए सोर्स अपोर्शनमेंट स्टडी, दिल्ली सरकार की ईवी पॉलिसी 2020, सीएक्यूएम का ग्रेप
सख्त नियम, लेकिन जमीनी स्तर पर पालन ठीक से नहीं
दिल्ली–एनसीआर को एक कॉमन एयरशेड माना जाता है, जिसमें दिल्ली के साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कुल 24 जिलों को मिलाकर 25 घटक क्षेत्र शामिल हैं। यह पूरा क्षेत्र लगभग 55,083 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इस बड़े इलाके में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए पुराने वाहनों पर रोक और निर्माण व विध्वंस (कंस्ट्रक्शन एंड डिमोलिशन) गतिविधियों पर सख्त नियम बनाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पालन ठीक से नहीं हो पा रहा है। हाल ही में ग्रेप तीन और चार को तेजी से लागू किए जाने के बावजूद कई जरूरी कदम प्रभावी ढंग से नहीं उठाए गए। उदाहरण के तौर पर, राज्य सरकारों को वर्क फ्रॉम होम जैसे प्रतिबंध लागू कराने थे और निर्माण गतिविधियों पर सख्ती से कार्रवाई सुनिश्चित करनी थी, लेकिन ऐसा पूरी तरह नहीं हो सका।
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