सुगा नृत्य फसल कटाई के बाद शुरू होती है परंपरा
सरगुजा के जानकार सिकंदर प्रजापति ने लोकल 18 को बताया कि सुगा नृत्य सरगुजा जिले की एक प्राचीन लोक परंपरा है, जिसे छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों में बसे सरगुजिया लोग भी आज तक निभाते हैं. धान की कटाई पूरी होते ही गांवों में अविवाहित बच्चे और किशोरियां 10 से 15 के समूह में एकत्र होकर घर-घर जाकर सुगा नृत्य करते हैं.
घर-घर जाकर अन्न संग्रह की अनूठी परंपरा
सिकंदर ने कहा कि सुगा नृत्य के दौरान बच्चे नाच-गाकर लोगों के घर पहुंचते हैं, जहां उन्हें चावल और धान दिया जाता है. बच्चे इस अन्न को पूरे आयोजन के दौरान संग्रहित करते हैं. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी पूरे उत्साह के साथ निभाई जाती है.
बच्चों की खुशी और उत्साह का प्रतीक है सुगा नृत्य
सिकंदर प्रजापति के अनुसार, खेती-किसानी का काम पूरा होने के बाद गांव में बच्चों के बीच खुशी और उत्साह का माहौल बन जाता है। इसी खुशी को अभिव्यक्त करने के लिए बच्चे सुगा नृत्य के माध्यम से घर-घर जाकर अन्न संग्रह करते हैं, जो आगे चलकर छेरता पर्व का आधार बनता है.
छेरता पर्व नए साल का सामूहिक उत्सव जानिए
जानकर ने बताया कि संग्रह किए गए धान और चावल को या तो उपयोग में लाया जाता है या बेच दिया जाता है. इसी से प्राप्त संसाधनों के जरिए नए साल के अवसर पर छेरता पर्व मनाया जाता है. इस पर्व में सभी बच्चे और गांववासी मिलकर उत्सव मनाते हैं. यह आयोजन एक तरह से सामूहिक पिकनिक जैसा होता है, जिसमें पूरे गांव की भागीदारी रहती है.
पूस पूर्णिमा पर मनाया जाता है छेरता पर्व
सिकंदर प्रजापति ने बताया कि छेरता पर्व सरगुजा के आदिवासी समाज का प्रमुख त्योहार है. यह पर्व धान की फसल कटने के बाद पूस महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है. जैसे ही पूस महीना शुरू होता है, उसी के साथ छेरता पर्व की शुरुआत हो जाती है, जो दो दिनों तक चलता है। इसे पुराने साल की विदाई और नए साल के स्वागत के रूप में देखा जाता है.
सामूहिक भोजन और जंगलों में उत्सव
पूर्वजों की परंपरा के अनुसार आज भी गांवों में सामूहिक रूप से खाने-पीने की व्यवस्था की जाती है. लोग समूह बनाकर जंगल जाते हैं और अपनी पसंद के अनुसार शाकाहारी और मांसाहारी भोजन तैयार करते हैं. इस दौरान पुआ, दाल, सब्जी, चिकन जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं.
भाईचारे और प्रकृति से जुड़ाव का संदेश
छेरता पर्व के माध्यम से सरगुजा के लोग आपसी भाईचारे, सामूहिकता और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देते हैं. यह पर्व न केवल सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करता है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य करता है। इसी उल्लास और परंपरा के साथ सरगुजा में नए साल का स्वागत किया जाता है.
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