Traditional Techniques In Surguja: छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण आधुनिक तकनीक के बावजूद अपने पुरखों की पारंपरिक खेती-किसानी तकनीकों को प्राथमिकता दे रहे हैं. धान की मिसाई आज भी बैल और दौरी की मदद से की जाती है, जबकि धान की सफाई सदियों पुरानी सूपा विधि से होती है. स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि सूपा से धान साफ करने पर अनाज पूरी तरह शुद्ध और उच्च गुणवत्ता वाला रहता है. यह पारंपरिक तकनीक पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है और ग्रामीणों का कहना है कि यह आधुनिक मशीनों से बेहतर परिणाम देती है.
पुरखों से सीखी पारंपरिक विधि
खलसाय ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने यह तकनीक अपने बाप-दादाओं को करते हुए देखी और उसी से सीखी है. पहले के समय में जब आधुनिक मशीनें उपलब्ध नहीं थीं, तब यही तरीका धान की सफाई के लिए सबसे ज्यादा प्रचलित था. इस विधि में अनुभव और मेहनत दोनों की जरूरत होती है, जो आज की पीढ़ी में धीरे-धीरे कम होती जा रही है.
बैलों और दौरी से होती है शुरुआत
खलसाय ने बताया कि धान की सफाई की प्रक्रिया सबसे पहले बैलों की मदद से शुरू होती है. बैलों से दौरी चलवाकर धान के पैरा को झरला जाता है, जिससे दानों को अलग किया जाता है. इसके बाद धान को इकट्ठा कर अगली प्रक्रिया के लिए तैयार किया जाता है.
सूपा से उड़ाकर होती है पूरी सफाई
खलसाय ने बताया कि झरलाई के बाद धान को सूपा में रखकर हवा में उड़ाया जाता है. इस दौरान भूसा और हल्का कचरा अलग हो जाता है और नीचे सिर्फ साफ धान बचता है. खलसाय का कहना है कि इस तरीके से धान पूरी तरह साफ हो जाता है और उसमें किसी तरह की मिलावट नहीं रहती.
मशीनें आईं, लेकिन भरोसा परंपरा पर
खलसाय ने कहा कि आज भले ही धान साफ करने के लिए कई आधुनिक मशीनें बाजार में उपलब्ध हैं, लेकिन वे अब भी पारंपरिक तरीके को ही बेहतर मानते हैं. उनके अनुसार, मशीनों से सफाई तो हो जाती है, लेकिन सूपा से उड़ाए गए धान की गुणवत्ता और शुद्धता अलग ही होती है और यही हम आदिवासीयो कि पहचान है.
About the Author
Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.