घसीया बाजा की खासियत यह थी कि इसकी धुनों में लोकसंस्कृति की खुशबू और सुकून दोनों महसूस होते थे, लेकिन बदलते वक्त के साथ लोगों की पसंद भी बदल गई है.आधुनिक जमाने में अब बड़े-बड़े डीजे, धूमाल और तेज आवाज वाले आधुनिक वाद्य यंत्रों की मांग तेजी से बढ़ी है. इसी कारण पारंपरिक सींग वाला घसीया बाजा धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है. लोक कलाकारों का कहना है कि अगर समय रहते इस पारंपरिक वाद्य यंत्र को संरक्षण और प्रोत्साहन नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी. देखिए ये रिपोर्ट जो सरगुजा की विलुप्त होती लोकधुन और बदलती सांस्कृतिक पसंद की कहानी बयां करती है.
पहले शादी घसिया बाजा के बिना अधूरी मानी जाती थी
मुकेश ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि पहले के समय में शादी-विवाह और पारंपरिक आयोजनों में घसिया बाजा का होना अनिवार्य माना जाता था. इसकी मौजूदगी से ही आयोजन को पूर्णता मिलती थी, लेकिन समय के साथ आधुनिक म्यूजिक सिस्टम ने इसकी जगह ले ली. मुकेश के अनुसार, जैसे-जैसे आधुनिकता बढ़ी, वैसे-वैसे बैंड-बाजा, डीजे और बड़े साउंड सिस्टम लोकप्रिय होते चले गए. तेज आवाज और आधुनिक धुनों के बीच पारंपरिक घसिया बाजा का उपयोग लगातार घटता गया.
घसिया बाजा लोगों को जोड़ने वाला माध्यम
मुकेश ने बताया कि घसिया बाजा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी धुन सुनते ही लोग अपने-आप नाचने लगते हैं. इसमें वह अपनापन और सुकून है, जो आधुनिक म्यूजिक सिस्टम में नहीं मिलता। यह लोकसंगीत समाज में आपसी जुड़ाव को मजबूत करता है. मुकेश ने बताया कि घसिया बाजा पूरी तरह पारंपरिक और प्राकृतिक होता है. इसमें लंबे सींग, लकड़ी और चमड़े से बने वाद्य, शहनाई, डफला जैसे बाजे शामिल होते हैं. इनसे निकलने वाली धुन भले ही तेज़ हो, लेकिन यह मन और दिमाग को अशांत नहीं करती, बल्कि शांति देती है.
सिर्फ 10 प्रतिशत रह गया है प्रचलन
मुकेश बताते हैं कि आज घसिया बाजा का प्रचलन महज 10 प्रतिशत के आसपास रह गया है. पहले लोग दिन-रात इसकी धुन पर समय बिताते थे, जबकि आज डीजे और धुमाल की तेज़ आवाज़ लंबे समय तक सहन करना मुश्किल हो गया है. मुकेश कहते हैं कि उनके लिए घसिया बाजा सिर्फ एक वाद्य नहीं बल्कि प्रकृति और संस्कृति से जुड़ाव का प्रतीक है. 35 वर्ष की उम्र में उन्होंने इसी के माध्यम से संगीत को समझा, उस दौर में म्यूजिक सिस्टम जैसी चीज़ें आम नहीं थीं.
पारंपरिक वाद्यों के संरक्षण की अपील
अंत में मुकेश ने संदेश दिया कि अत्यधिक शोर करने वाले डीजे और आधुनिक म्यूजिक सिस्टम पर नियंत्रण होना चाहिए. समाज के हर वर्ग के लिए वही संगीत बेहतर है, जो संस्कृति और प्रकृति से जुड़ा हो. उनका मानना है कि घसिया बाजा जैसे पारंपरिक वाद्यों का संरक्षण और उपयोग जरूरी है, ताकि हमारी लोकसंस्कृति जीवित रह सके.
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